कालिंदी Quotes
कालिंदी
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कालिंदी Quotes
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“पढ़ाई ने तेरे मन को सूक्ष्म बना दिया है, तेरा प्रबल स्वतंत्रता-बोध, तेरी एकाग्र ज्ञान-निष्ठा तुझे धीरे-धीरे स्वाभाविक जीवनधारा से काटती जा रही है। तू कभी झुकना नहीं सीख पाएगी। जहाँ बैर की प्रबल भावना होती है वहाँ फिर प्रेम नहीं रहता और जहाँ प्रेम नहीं रहता वहाँ फिर सहज सृष्टि भी नहीं हो सकती। मैं आज तुझसे एकान्त में यही कहने आई हूँ चडी, कभी किसी जिद में कोई प्रण नहीं कर बैठना। मैंने यही भूल की थी और मेरे मायके के मिथ्या दम्भ ने ही शायद मुझे ससुराल के प्रति उदासीन कर दिया। मनुष्य तो पशु को भी साध सकता है, सर्कस के शेर-भालुओं को नहीं देखा? मैं चाहती तो क्या तेरे पिता को...”
― कालिंदी
― कालिंदी
“माँ ने मेरे हाथ से शीशी छीन पूरा पानी नदी में ही उलट दिया था-मूर्ख कहीं का! यह क्या गंगाजल है जो गंगाजली में भर घर ले जा रहा है? गोमती कुँआरी नदी है, इन्हें कोई घर नहीं ले जा सकता। आज लग रहा है-जीवन में दूसरी बार माँ के अदृश्य हाथ ने मेरे हाथ से गोमती का जल छीन, फिर गोमती ही में उलट दिया है और मेरे कान में कह रही है-गोमती कुँआरी नदी है, इन्हें कोई घर नहीं ले जा सकता।”
― कालिंदी
― कालिंदी
“सुनहली पिरुल घास पर स्केट-सा करती चली जा रही थी। यह था स्वयं प्रकृति का बनाया एस्कलेटर एक कदम रखो और सर्र से नीचे पहुँच जाओ। न जाने कौन-सी अनामा वेगवती नदी थी वह। "पहाड़ की नदियों के नाम नहीं होते री," पूछने पर मामा ने बताया, "बस, गाड़ कहते है। कोई कोसी की गाड़ है, कोई सुवाल की तो कोई अलकनन्दा की।”
― कालिंदी
― कालिंदी
“यह रोग होने वाला हो तो भगवान को भी नहीं छोड़ता। जानती है भानजी, परमप्रतापी भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब को भी यही रोग हो गया था और उन्होंने उसे छुटकारा दिलाने शाकद्वीप से मग ब्राह्मणों को बुलाया था क्योंकि वे ही सूर्य-पूजा के अधिकारी थे। सूर्य-पूजा ही इस चिकित्सा का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। यह शरीर को कुत्सित बनाता है, इसी से इसे कुष्ठ कहा गया है। पर शरीर से अधिक कुत्सित बना देता है बेचारे रोगी के मन को।”
― कालिंदी
― कालिंदी
“ऐसी मृत्युंजयी औषधियाँ जो तुम्हें ढूँढने पर भी तुम्हारी अंग्रेजी डाक्टरी पोथों में नहीं मिलेंगी। सुनेगी? तब सुन-लौह, तुवरक, मल्लातक, बाकुची, गुग्गुल और चित्रक! और फिर माणीभद्र वटक योग का विधान यानी रोगियों को एक-एक पक्ष पर वमन, एक-एक महीने में विरेचन और तीन-तीन दिन पर शिरोविरेचन, फिर छः-छः महीने पर रक्तमोक्षण।”
― कालिंदी
― कालिंदी
“चिकित्सक, जिनका व्यक्तित्व ही उस पर्वतीय नदी का-सा था, जो अपना सर्वस्व लुटाकर, घने वन-अरण्यों के बीच, गाँव-गाँव को सींचती, गुमनाम बहती, गुमनाम ही खो जाती है। समाज द्वारा बहिष्कृत अपने उन मरीजों को वै एक कतार में बिठा, सूर्य को अर्ध्य दिलवाते और फिर आदित्य आराधना में समवेत स्वर गूँजने लगते : नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रयै नम: ज्योतिर्गणानां पतये विनाधिपतये नम: जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: नमो नम: सहस्रांशो आदित्याय नमो नम:।”
― कालिंदी
― कालिंदी
“रीठा, हरड़, पिपरमेंट, मुरेठी, आँवला, मूसाकन्द, वासा, दारूहल्दी, गुलबनपुशा, पाषाणभेद, जटामासी, रतनजोत, कर्णफूल जैसी बहुमूल्य जड़ी-बूटियों का उनके पास अशेष भंडार था।”
― कालिंदी
― कालिंदी
“भूतलीय वैभिन्नय, बंजर भूखी जमीन, दुर्गम चट्टानों का प्राकृतिक अवरोध और प्रकृति के नित्य बदलते तैवर कभी भरभराकर पूरा पहाड़ ही गिर गया और कभी बर्फ का खिसकता ऐवलांश खेत के खेत धरा मैं धँसा गया, फिर भी कुमाऊँनियों के अदम्य साहस, लगन और संयम के मूर्तिमान स्वरूप थे पिरीममा। चौवीसों घंटे ओठों पर लगी हँसी, आत्मविश्वास से दमकता चेहरा!”
― कालिंदी
― कालिंदी
“वह क्यों कभी काली-कराली चंडिका नहीं वन पाती? क्यों चंडिका वन शिव को भी परों तले गेंदने में सक्षम नहीं वन पाती? कहाँ विलीन हो गई है रुद्राणी, दशप्रहरणधारिणी? क्या हम लक्ष्मी को सदा विष्णु के चरणों मैं ही वैठी देखते रहेंगे?”
― कालिंदी
― कालिंदी
“पहाड़ का ही फल खाऊँ तो कहे दे रहा हूँ, दो टके के काफल, हिंसालु, किल्मोड़ी, मिल्मोड़ी, नहीं खा सकता, मैं खजूर ही खाऊँगा।”
― कालिंदी
― कालिंदी
“हरेल, डोर दुबज्योड़ा, बग्वाली—कौन-सा तीज-त्यौहार नहीं मनाया जी हमने?" "अच्छा, बताओ तो 'खतडुवा' मनाया है कभी?”
― कालिंदी
― कालिंदी
“भैंस को क्या कहीं अपने सींग भारी होते हैं? उस कसाई के पास अपनी इस कपिला गाय को भेज दूँ,”
― कालिंदी
― कालिंदी
“हाथ बाँधे वे दीन-हीन याचक की मुद्रा में वर के पिता के सम्मुख नतजानु खड़े एक ही बात दोहरा रहे थे, "क्षमा करें”
― कालिंदी
― कालिंदी
“एक क्षीण कलेवरा नदी थी और एक जीर्ण शिवमन्दिर। आज यह परिवेश उसकी मनःस्थिति से एकदम मेल खा रहा था।”
― कालिंदी
― कालिंदी
