लाक्षागृह Quotes

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लाक्षागृह (कृष्ण की आत्मकथा, # 4) लाक्षागृह by Manu Sharma
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लाक्षागृह Quotes Showing 1-17 of 17
“मनुष्य जब किसी और का दास होता है तो वह मुक्त होने की चेष्टा भी करता है और मुक्त हो भी सकता है। पर वह जब स्वयं अपना ही दास हो तब प्रथम वह मुक्त होना नहीं चाहता और फिर चाहकर भी वह मुक्त हो नहीं पाता।”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“मनुष्य जब स्वयं अपने विरुद्ध खड़ा होता है तो पराजय और विजय के लिए नहीं खड़ा होता, स्वयं को तौलने के लिए खड़ा होता है। यही उसका आत्माकलन है। यह घड़ी बड़े संकट की होती है—और महत्त्व की भी।”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“किसी और से लड़कर तो मनुष्य जीत भी सकता है, पर वह जब स्वयं अपने से लड़ने लगता है तब पराजित ही होता है।”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“मनुष्य हो या कोई समाज, वह अपनी मूल पहचान खोता नहीं है, उसपर अन्य पहचान ओढ़ अवश्य लेता है।”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“वह दीप क्या, जो अंधकार से घिरा न हो! अँधेरा ही उसे अस्मिता प्रदान करता है और उसकी उपयोगिता भी स्थापित करता है।”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“नारी का ऐसा दुरुपयोग तो कदाचित् ही किसी युग में हुआ हो। उसकी कोई अपनी इच्छा नहीं, आकांक्षा नहीं, अभीप्सा नहीं। वह केवल कूटनीति की समिधा मात्र”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“प्रेम गंगा की तरह पवित्र है और समुद्र की तरह विराट्। किसी भी स्नानार्थी या जल ग्रहण करनेवाले से गंगा यह नहीं कहती कि तुम मेरी पवित्रता को मत बाँटो। समुद्र ने कभी किसीसे कहा है कि मेरी विशालता का विभाजन मत करो? फिर प्रेम बाँटने की सीमा में आता भी नहीं। पूर्ण को पहले तो विभाजित नहीं किया जा सकता; फिर यदि किसी प्रकार विभाजित भी किया जाएगा तो पूर्ण ही बचेगा। वैसे प्रेम पहले तो बँट नहीं सकता और यदि बँटेगा भी तो प्रेम प्रेम ही बचेगा।”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“हताशा की गर्त में जब कोई गिरने लगता है तब गिरने की उसकी गति बढ़ती ही जाती है।”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“मनुष्य को एकाकीपन का ध्यान उसी समय आता है, जब उसे अपनी किसी दुर्बलता का आभास होता है।”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“मृत्यु से साक्षात्कार कर रहे व्यक्ति के लिए जीवन का मोह अधिक हो जाता है। जीवन जब छूटने को होता है तो वह और अधिक चिपकता है। यह स्थिति उतनी दुःखद नहीं होती, जितनी पीड़ादायक होती है।”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“वर्षा अपने पूर्ण यौवन पर थी। आज दो दिनों से फुहार पड़ रही थी। यह भीगा सवेरा उस नायिका के समान मादक और सुहावना था, जिसका आँचल तो हवा में लहरा रहा हो, पर जिसका झीना वस्त्र उसके शरीर से लिपटकर एकाकार हो गया हो।”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“बाँह में रुक्मिणी के रहते हुए भी आह में राधा ही रहती है। रुक्मिणी मेरे जीवन के साथ है और राधा मेरी आत्मा के साथ। जीवन समाप्त हो जाने के बाद रुक्मिणी का संबंध समाप्त हो जाएगा; पर राधा का संबंध जन्म-जन्मांतर तक चलता रहेगा।”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“बात यद्यपि कितनी पुरानी हो चुकी है। तब से यमुना का कितना पानी बह गया होगा। संसार कितना बदल गया; पर मैं अपनी मानसिकता बदल नहीं पाया, अपनी यह दुर्बलता छोड़ नहीं पाया। प्रकृति के परिवेश बदलते ही मैं एक ऐसे संसार में चला जाता हूँ जहाँ न दुःख है, न व्यग्रता है, न चिंता है, न राजनीति है और न यहाँ की झंझटें। वहाँ केवल राधा है और मैं हूँ। प्रकृति की सरसता है और है सरसता की प्रकृति।”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“विकल्प की जानकारी रहने पर संकल्प की दृढ़ता दुर्बल”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“मृत्यु तो अंतिम विकल्प है, वह कभी संकल्प नहीं होता—और जीवन संकल्प के साथ जीया जाता है। भागने से समस्या हल नहीं होती वरन् वह और भयंकरता के साथ पीछा करती है।”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“पौधे के जमने के लिए धरती की उर्वरता ही पर्याप्त नहीं होती। जल और मौसम की अनुकूलता भी चाहिए।”
Manu Sharma, लाक्षागृह
“धर्म को मानिए या न मानिए, वह तो रहेगा ही; क्योंकि वह किसी व्यक्ति की संपत्ति नहीं है कि वह उसे उठाकर फेंक दे। धर्म तो समाज का है, समाज द्वारा है, समाज के लिए है। वह भी तब से जब से समाज है और तब तक रहेगा जब तक समाज रहेगा।”
Manu Sharma, लाक्षागृह