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लाक्षागृह Quotes
लाक्षागृह
by
Manu Sharma73 ratings, 4.67 average rating, 2 reviews
लाक्षागृह Quotes
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“मनुष्य जब स्वयं अपने विरुद्ध खड़ा होता है तो पराजय और विजय के लिए नहीं खड़ा होता, स्वयं को तौलने के लिए खड़ा होता है। यही उसका आत्माकलन है। यह घड़ी बड़े संकट की होती है—और महत्त्व की भी।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“किसी और से लड़कर तो मनुष्य जीत भी सकता है, पर वह जब स्वयं अपने से लड़ने लगता है तब पराजित ही होता है।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“मनुष्य हो या कोई समाज, वह अपनी मूल पहचान खोता नहीं है, उसपर अन्य पहचान ओढ़ अवश्य लेता है।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“वह दीप क्या, जो अंधकार से घिरा न हो! अँधेरा ही उसे अस्मिता प्रदान करता है और उसकी उपयोगिता भी स्थापित करता है।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“नारी का ऐसा दुरुपयोग तो कदाचित् ही किसी युग में हुआ हो। उसकी कोई अपनी इच्छा नहीं, आकांक्षा नहीं, अभीप्सा नहीं। वह केवल कूटनीति की समिधा मात्र”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“प्रेम गंगा की तरह पवित्र है और समुद्र की तरह विराट्। किसी भी स्नानार्थी या जल ग्रहण करनेवाले से गंगा यह नहीं कहती कि तुम मेरी पवित्रता को मत बाँटो। समुद्र ने कभी किसीसे कहा है कि मेरी विशालता का विभाजन मत करो? फिर प्रेम बाँटने की सीमा में आता भी नहीं। पूर्ण को पहले तो विभाजित नहीं किया जा सकता; फिर यदि किसी प्रकार विभाजित भी किया जाएगा तो पूर्ण ही बचेगा। वैसे प्रेम पहले तो बँट नहीं सकता और यदि बँटेगा भी तो प्रेम प्रेम ही बचेगा।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“मनुष्य को एकाकीपन का ध्यान उसी समय आता है, जब उसे अपनी किसी दुर्बलता का आभास होता है।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“मृत्यु से साक्षात्कार कर रहे व्यक्ति के लिए जीवन का मोह अधिक हो जाता है। जीवन जब छूटने को होता है तो वह और अधिक चिपकता है। यह स्थिति उतनी दुःखद नहीं होती, जितनी पीड़ादायक होती है।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“वर्षा अपने पूर्ण यौवन पर थी। आज दो दिनों से फुहार पड़ रही थी। यह भीगा सवेरा उस नायिका के समान मादक और सुहावना था, जिसका आँचल तो हवा में लहरा रहा हो, पर जिसका झीना वस्त्र उसके शरीर से लिपटकर एकाकार हो गया हो।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“बाँह में रुक्मिणी के रहते हुए भी आह में राधा ही रहती है। रुक्मिणी मेरे जीवन के साथ है और राधा मेरी आत्मा के साथ। जीवन समाप्त हो जाने के बाद रुक्मिणी का संबंध समाप्त हो जाएगा; पर राधा का संबंध जन्म-जन्मांतर तक चलता रहेगा।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“बात यद्यपि कितनी पुरानी हो चुकी है। तब से यमुना का कितना पानी बह गया होगा। संसार कितना बदल गया; पर मैं अपनी मानसिकता बदल नहीं पाया, अपनी यह दुर्बलता छोड़ नहीं पाया। प्रकृति के परिवेश बदलते ही मैं एक ऐसे संसार में चला जाता हूँ जहाँ न दुःख है, न व्यग्रता है, न चिंता है, न राजनीति है और न यहाँ की झंझटें। वहाँ केवल राधा है और मैं हूँ। प्रकृति की सरसता है और है सरसता की प्रकृति।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“मृत्यु तो अंतिम विकल्प है, वह कभी संकल्प नहीं होता—और जीवन संकल्प के साथ जीया जाता है। भागने से समस्या हल नहीं होती वरन् वह और भयंकरता के साथ पीछा करती है।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
“पौधे के जमने के लिए धरती की उर्वरता ही पर्याप्त नहीं होती। जल और मौसम की अनुकूलता भी चाहिए।”
― लाक्षागृह
― लाक्षागृह
