द्वारका की स्थापना Quotes
द्वारका की स्थापना
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Manu Sharma71 ratings, 4.45 average rating, 2 reviews
द्वारका की स्थापना Quotes
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“खोई हुई वस्तु का खोज पाना कभी-कभी कठिन होता है; पर छोड़ी हुई वस्तु अपनी जान में रहती है—और कभी-कभी अपने पास ही।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“मेरे मन पर अदृश्य जगत् से दृश्य जगत् का अधिक प्रभाव है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“द्विविधा की धरती और असत्य का मौसम राजनीति के बिरवे को पनपने के लिए बड़े अनुकूल पड़ते हैं।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“सत्ता का सुख बड़ा मादक होता है। उसे कोई संन्यस्त मानसिकता ही ठुकरा सकती है। लोग मुझमें अब वीतरागी संन्यासी के भी दर्शन कर रहे थे। इससे मेरे ईश्वरत्व पर एक दूसरा ही पानी चढ़ आया था।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“आप चमत्कार को भी चमत्कृत कर देनेवाले चमत्कारी हैं।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“फिर विस्थापित को तो स्थापित किया जा सकता है, पर हमारे सामने स्थापित को स्थापित करने का प्रश्न था।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“अतीत का अस्तित्व था, वर्तमान का अस्तित्व है। क्या पता भविष्य होगा या नहीं। जो भोगा गया, उसके बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है। जो भोगा जा रहा है, उसके विषय में भी कुछ कहा जा सकता है। जो अभी तक काल की मुट्ठी में बंद है, उसके बारे में क्या कहा जाए!”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“भाग्य का दोष देने का तात्पर्य है कि कर्म पर से आपका विश्वास उठता जा रहा है।’’ मैंने बड़ी गंभीरता से कहा, ‘‘कर्म में विश्वास रखिए, भाग्य आपके साथ के लिए विवश होगा।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“जब अन्याय, अधर्म और लोक नियम-विरुद्ध कार्य होने लगते हैं तब राजसत्ता राजा के हाथों से छूटकर प्रजा के हाथों में चली जाती है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“यही तो इस संसार की विचित्रता है, यहाँ कभी किसीका चाहा नहीं हुआ है। वही हुआ है, जिसे नियति ने चाहा”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“ऊपर से किया गया आक्रमण तब तक प्रभावकर और सफल नहीं होता जब तक भीतर से भी व्यवस्थित ढंग से आक्रमण न किया जाए।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“कभी-कभी पागल भी होना चाहिए; क्योंकि जीवन की एकरसता को जोड़ने के लिए कभी-कभी पागलपन की भी बड़ी आवश्यकता पड़ती है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“बाँस बाँसुरी की अस्मिता नहीं है, वह तो केवल आधार है।...आधार के न रहने पर भी अस्मिता रहेगी। शरीर के न रहने पर भी आत्मा तो रहती ही है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“मनुष्य नियति का एक ऐसा सुंदर पुष्प है, जिसके खिलने का उसका एक निजी कारण होता है, उसे परमात्मा कोई-न-कोई कार्य सौंपता है और कार्य के समाप्त होते ही वह स्वयं झर जाता है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“आज का युद्ध पराक्रम से कम और प्रचार से अधिक जीता जाता है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“राजनीति और युद्ध महत्त्वाकांक्षा के दो शिशु हैं। अंतर यही है कि राजनीति प्रिय शिशु है और युद्ध शिशु होकर भी अप्रिय। कोई भी युद्ध नहीं चाहता।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“प्रतिशोध प्रतिक्रियात्मक होता है, संकल्प क्रियात्मक। प्रतिशोध में बदले की भावना है, संकल्प में हमारा कर्तव्यबोध। प्रतिक्रियात्मक होने से प्रतिशोध का लक्ष्य किसी व्यक्ति या समुदाय तक ही होता है; पर संकल्प का लक्ष्य उदात्त है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“अतीत को भुलाना अपने इतिहास को भुलाना है।’’ मैंने कहा, ‘‘और इतिहास को भुलाकर कोई व्यक्ति या संस्कृति अपनी पहचान भूल जाती है। अतएव इतिहास को भूलना नहीं चाहिए और इतिहास में जीना भी नहीं चाहिए।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“अतीत को देखनेवाला व्यक्ति अतीत में जीने लगता है—और अतीतजीवी वर्तमान को ठीक से भोग नहीं पाता।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“क्रोध दूसरों की हानि बाद में करता है, अपनी पहले। क्रोध बुद्धि का नाश करता है और बुद्धि का नाश स्वयं का विनाश है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“उन्माद और पश्चात्ताप दोनों भयंकर होते हैं। एक में व्यक्ति गिरकर टूटता है और दूसरे में टूटकर गिरता है। मैंने”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“ब्राह्मण जब पतित होता है तो उसके पतन की कोई सीमा नहीं होती। वह सीधे राक्षस हो जाता है। उनसे उद्धार के लिए ही आप जैसे लोगों का जन्म होता है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“जिसमें स्वयं परिस्थितियों को पढ़ने की योग्यता हो, उसे आदेश देना निरर्थक भी है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“क्रोध की आँधी की अंतिम परिणति आँसुओं की बरसात में ही होती”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“एक मरण ही तो ऐसा है, जो निश्चित है, ध्रुव है। जीवन का कुछ भी निश्चित नहीं है। यदि निश्चित है तो उसकी अनिश्चितता—और यही अनिश्चितता जीवन का रस है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“परिस्थितियों को दोषी ठहराना अपने व्यक्तित्व की दुर्बलता को स्वीकार करना है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“दूसरों को पहचाननेवाली दृष्टि तो भगवान् सबको देता है, पर अपने को पहचाननेवाली दृष्टि साधना से प्राप्त होती है।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
“राजा कोई और नहीं, आपके बीच का ही एक ऐसा शक्तिशाली व्यक्ति होता है, जिसे आप अपनी शक्ति का एक-एक अंश देकर उसे महाशक्तिशाली बना देते हैं। उस महाशक्तिशाली को भी हमेशा यह सोचते रहना चाहिए कि प्रजा की जिस शक्ति से मैं बना हूँ, प्रजा वह शक्ति हमसे वापस भी ले सकती है। इस महान् सत्य को मैं कभी नहीं भूलूँगा और संकल्प करता हूँ कि आपका रहा हूँ, आपका रहूँ और आपका ही रहूँगा।”
― द्वारका की स्थापना
― द्वारका की स्थापना
