दुरभिसंधि Quotes
दुरभिसंधि
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Manu Sharma86 ratings, 4.53 average rating, 3 reviews
दुरभिसंधि Quotes
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“शरीरजन्य विकृति से प्रकृतिजन्य विकृति अधिक घातक होती है; क्योंकि एक जैविक है और दूसरी मानसिक, एक बाहरी है और दूसरी भीतरी। बाहर से भीतर का राक्षस अधिक भयावह और खतरनाक है। अगर कहीं बाहर-भीतर दोनों राक्षस हों, तो अनर्थ ही हो जाएगा।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“जब जबानें वायु का पंख लगाकर आकाश में तैरने लगती हैं, तब वे बड़े-से-बड़े निरंकुश शासक की पकड़ के बाहर हो जाती हैं।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“सत्ता से हटा व्यक्ति तूफान में टूटी डाल की तरह बेकार होता है। वह निर्जीव-सा अपने ही वृक्ष को देखता रह जाता है और सूखता जाता है। नदी से निकाली हुई नाव की तरह वह केवल इतिहास को अपने सीने से लगाकर वर्तमान की धूल फाँकता है और भविष्य का अँधेरा देखता है।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“नियति की डगर सदा अज्ञात होती है, मालिनी। हमें उस अज्ञात में से ही ज्ञात को खोजना पड़ता है।...यही तो जीवन की साधना है।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“संन्यास एक ऐसा आश्रम है, जिसमें सिंहासन नहीं, सिंहासन की आसक्ति छोड़नी पड़ेगी। सिंहासन छोड़ने पर भी सिंहासन की आसक्ति नहीं छूटती। यह विचार नहीं छूटता कि हमने सिंहासन त्यागा है।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“जैसे आँख में रहकर आँख को नहीं देखा जा सकता, उसको देखने के लिए तो आँखों से बाहर आना पड़ेगा, वैसे ही राजभवन को देखने के लिए राजभवन से बाहर रहना पड़ेगा।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“शिक्षा कभी पूरी नहीं होती। सरिता के प्रवाह की तरह वह जीवन भर चलती रहती है। उसका चलता रहना ही जीवन की सार्थकता है। और उस प्रवाह के रुकते ही बंद पानी की तरह मानव चिंतन में सड़न उत्पन्न हो जाती है।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“जब तक व्यक्ति पतित होता रहता है, तब तक उसे पतन की अनुभूति होती है और जब वह पतन जीने लगता है, तब वह पतन की अनुभूति भी खो देता है।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“ब्राह्मण संपत्ति का नहीं, सत्ता का नहीं वरन् सम्मान का भूखा होता है। यही उसकी महानता भी है और दुर्बलता भी।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“जब मनुष्य नहीं रहता तब लोगों के सामने उसकी बुराई भी नहीं रहती। ऐसी स्थिति में उसके प्रति एक सहानुभूति की लहर उभरती है।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“प्रतिहिंसा वह आग है, जो पैदा होती है दूसरों को जलाने के लिए और अंत में स्वयं जलकर खाक हो जाती है।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“भैया और मेरी प्रकृति में एक मौलिक अंतर है। वह ईश्वर पर अधिक और अपने पर कम विश्वास करते हैं; पर मैं अपने पर अधिक और ईश्वर पर कम विश्वास करता हूँ। मैं सोचता हूँ कि मैं अपना ईश्वर स्वयं हूँ। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकारता हूँ, वरन् ईश्वर को अपने अस्तित्व से पहचानता हूँ। चिंतन के इस अंतर ने हमारी और उनकी जीवन-पद्धति में भी अंतर ला दिया है। वह सोचते हैं कि जो करेगा, भगवान् ठीक करेगा। मैं सोचता हूँ, ऐसा पड़ेगा ही क्यों?”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“राधा की भक्ति तो संयोग प्रेम की घनीभूत छाया है। मेरी भक्ति तो वियोग प्रेम की। एक में मिलन का संतोष है तो दूसरे में वियोग की छटपटाहट। राधा ने कभी आपको खोया नहीं था, मैंने कभी आपको पाया ही नहीं था। राधा का आपके प्रति आकर्षण दर्शन के कारण था। मेरे आकर्षण में अदर्शन है, सहज विश्वास है, श्रवणमात्र पर आधृत पूर्वानुराग है। एक में बाह्य इंद्रियों का लगाव था और दूसरे में आंतरिक। अब आप ही सोचिए, किसकी भक्ति में घनत्व अधिक है?”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“प्रेम में लौकिकता और पारलौकिकता का भेद नहीं होता। प्रेम तो प्रेम है। प्रेम का घनीभूत हो जाना ही भक्ति है।...जो कुछ मैंने लगाया है, वह अंगराग ही नहीं, मेरा मनराग है।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“आकर्षण में एक प्रकार का खिंचाव अवश्य होता है, पर भोग की इच्छा नहीं होती, जितनी आसक्ति में।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“राजा अपने अहं का दास होता है और ऋषि अपने अहं का स्वामी। स्वामी को दास नहीं नचा सकता, पर दास को स्वामी तो नचा ही सकता है।”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
“हे देव सवितः (सूर्य भगवान्)! तुम हमारे विश्व के पापों को नष्ट करो और जो कल्याणकारी हो उसे प्रदान करो; क्योंकि कल्याणकारी क्या होगा, इसे मैं नहीं जानता। अब तक मैंने बहुत कुछ कल्याणकारी सोचा था, प्रभु! पर उसमें से कुछ भी तो कल्याणकारी नहीं निकला। मैंने सोचा था कि सत्ता कल्याणकारी होगी; किंतु मेरे लिए वह भी कल्याणकारी नहीं हुई। मैंने सोचा था, संपत्ति कल्याणकारी होगी; पर वह भी असत्य निकला। मैंने सोचा था, संततियाँ कल्याणकारी होंगी। मैंने उनके लिए प्रार्थना भी की। मेरी प्रार्थना सुनी भी गई। नौ-नौ पुत्र हुए; पर मेरे पुत्र ने ही मुझे बंदीगृह में डाला और आज उन्हींकी अंत्येष्टि करने के लिए मैं जीवित हूँ।’’ उनका गला भर आया। आँखें डबडबा आईं। वह कुछ क्षणों के लिए मौन हो गए। ‘‘इसीलिए अब मैं प्रभु पर ही छोड़ता हूँ कि अब तुम्हीं निश्चित करो, प्रभु, कि मेरे लिए क्या कल्याणकारी है?”
― दुरभिसंधि
― दुरभिसंधि
