दुरभिसंधि Quotes

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दुरभिसंधि (कृष्ण की आत्मकथा, # 2) दुरभिसंधि by Manu Sharma
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“इसे सदा समझो कि ‘असंभव’ शब्द देश-कालसापेक्ष है। जो आज यहाँ असंभव है, वह कल कहीं आपसे आप भी संभव हो सकता है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“शरीरजन्य विकृति से प्रकृतिजन्य विकृति अधिक घातक होती है; क्योंकि एक जैविक है और दूसरी मानसिक, एक बाहरी है और दूसरी भीतरी। बाहर से भीतर का राक्षस अधिक भयावह और खतरनाक है। अगर कहीं बाहर-भीतर दोनों राक्षस हों, तो अनर्थ ही हो जाएगा।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“जब जबानें वायु का पंख लगाकर आकाश में तैरने लगती हैं, तब वे बड़े-से-बड़े निरंकुश शासक की पकड़ के बाहर हो जाती हैं।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“सत्ता से हटा व्यक्ति तूफान में टूटी डाल की तरह बेकार होता है। वह निर्जीव-सा अपने ही वृक्ष को देखता रह जाता है और सूखता जाता है। नदी से निकाली हुई नाव की तरह वह केवल इतिहास को अपने सीने से लगाकर वर्तमान की धूल फाँकता है और भविष्य का अँधेरा देखता है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“नियति की डगर सदा अज्ञात होती है, मालिनी। हमें उस अज्ञात में से ही ज्ञात को खोजना पड़ता है।...यही तो जीवन की साधना है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“निराशा की चरम सीमा पर संकोच की दीवारें स्वयं गिर जाती हैं। आज”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“राजनीति के चरण हवा के रुख पर चलते और बदलते हैं।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“संन्यास एक ऐसा आश्रम है, जिसमें सिंहासन नहीं, सिंहासन की आसक्ति छोड़नी पड़ेगी। सिंहासन छोड़ने पर भी सिंहासन की आसक्ति नहीं छूटती। यह विचार नहीं छूटता कि हमने सिंहासन त्यागा है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“जैसे आँख में रहकर आँख को नहीं देखा जा सकता, उसको देखने के लिए तो आँखों से बाहर आना पड़ेगा, वैसे ही राजभवन को देखने के लिए राजभवन से बाहर रहना पड़ेगा।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“मदिरा एक ऐसी कुंजी है, जिससे व्यक्ति की नीयत का हर ताला खुल जाता है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“ब्रह्मचारी को भीख और दूसरों को सीख तो हर व्यक्ति दे सकता है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“शिक्षा कभी पूरी नहीं होती। सरिता के प्रवाह की तरह वह जीवन भर चलती रहती है। उसका चलता रहना ही जीवन की सार्थकता है। और उस प्रवाह के रुकते ही बंद पानी की तरह मानव चिंतन में सड़न उत्पन्न हो जाती है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“जब सत्य विश्वास से परे हो जाता है, तभी वह चमत्कार की संज्ञा पाता है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“सत्ता का अस्तित्व कूटनीति की गोद में पलता है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“जब तक व्यक्ति पतित होता रहता है, तब तक उसे पतन की अनुभूति होती है और जब वह पतन जीने लगता है, तब वह पतन की अनुभूति भी खो देता है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“ब्राह्मण संपत्ति का नहीं, सत्ता का नहीं वरन् सम्मान का भूखा होता है। यही उसकी महानता भी है और दुर्बलता भी।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“निर्णय लेने की क्षमता जब निरंकुश हो जाती है तब वह अराजकता को जन्म देती है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“राजनीति संतों का आशीर्वाद चाहती है, उनकी सलाह नहीं।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“जब मनुष्य नहीं रहता तब लोगों के सामने उसकी बुराई भी नहीं रहती। ऐसी स्थिति में उसके प्रति एक सहानुभूति की लहर उभरती है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“प्रतिहिंसा वह आग है, जो पैदा होती है दूसरों को जलाने के लिए और अंत में स्वयं जलकर खाक हो जाती है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“भैया और मेरी प्रकृति में एक मौलिक अंतर है। वह ईश्वर पर अधिक और अपने पर कम विश्वास करते हैं; पर मैं अपने पर अधिक और ईश्वर पर कम विश्वास करता हूँ। मैं सोचता हूँ कि मैं अपना ईश्वर स्वयं हूँ। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकारता हूँ, वरन् ईश्वर को अपने अस्तित्व से पहचानता हूँ। चिंतन के इस अंतर ने हमारी और उनकी जीवन-पद्धति में भी अंतर ला दिया है। वह सोचते हैं कि जो करेगा, भगवान् ठीक करेगा। मैं सोचता हूँ, ऐसा पड़ेगा ही क्यों?”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“राधा की भक्ति तो संयोग प्रेम की घनीभूत छाया है। मेरी भक्ति तो वियोग प्रेम की। एक में मिलन का संतोष है तो दूसरे में वियोग की छटपटाहट। राधा ने कभी आपको खोया नहीं था, मैंने कभी आपको पाया ही नहीं था। राधा का आपके प्रति आकर्षण दर्शन के कारण था। मेरे आकर्षण में अदर्शन है, सहज विश्वास है, श्रवणमात्र पर आधृत पूर्वानुराग है। एक में बाह्य इंद्रियों का लगाव था और दूसरे में आंतरिक। अब आप ही सोचिए, किसकी भक्ति में घनत्व अधिक है?”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“प्रेम में लौकिकता और पारलौकिकता का भेद नहीं होता। प्रेम तो प्रेम है। प्रेम का घनीभूत हो जाना ही भक्ति है।...जो कुछ मैंने लगाया है, वह अंगराग ही नहीं, मेरा मनराग है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“प्रेम के घनत्व में विश्वास का संकट नहीं होता।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“जन्म की परिस्थितियाँ भी व्यक्ति के नामकरण को बहुत प्रभावित करती”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“आकर्षण में एक प्रकार का खिंचाव अवश्य होता है, पर भोग की इच्छा नहीं होती, जितनी आसक्ति में।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“राजा अपने अहं का दास होता है और ऋषि अपने अहं का स्वामी। स्वामी को दास नहीं नचा सकता, पर दास को स्वामी तो नचा ही सकता है।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“अनुकरण की विद्या साधना की विद्या के बहुत पीछे होती है—और साथ ही अपूर्ण भी।”
Manu Sharma, दुरभिसंधि
“हे देव सवितः (सूर्य भगवान्)! तुम हमारे विश्व के पापों को नष्ट करो और जो कल्याणकारी हो उसे प्रदान करो; क्योंकि कल्याणकारी क्या होगा, इसे मैं नहीं जानता। अब तक मैंने बहुत कुछ कल्याणकारी सोचा था, प्रभु! पर उसमें से कुछ भी तो कल्याणकारी नहीं निकला। मैंने सोचा था कि सत्ता कल्याणकारी होगी; किंतु मेरे लिए वह भी कल्याणकारी नहीं हुई। मैंने सोचा था, संपत्ति कल्याणकारी होगी; पर वह भी असत्य निकला। मैंने सोचा था, संततियाँ कल्याणकारी होंगी। मैंने उनके लिए प्रार्थना भी की। मेरी प्रार्थना सुनी भी गई। नौ-नौ पुत्र हुए; पर मेरे पुत्र ने ही मुझे बंदीगृह में डाला और आज उन्हींकी अंत्येष्टि करने के लिए मैं जीवित हूँ।’’ उनका गला भर आया। आँखें डबडबा आईं। वह कुछ क्षणों के लिए मौन हो गए। ‘‘इसीलिए अब मैं प्रभु पर ही छोड़ता हूँ कि अब तुम्हीं निश्चित करो, प्रभु, कि मेरे लिए क्या कल्याणकारी है?”
Manu Sharma, दुरभिसंधि