अभिज्ञान Quotes
अभिज्ञान
by
नरेंद्र कोहली, Narendra Kohli157 ratings, 4.66 average rating, 19 reviews
अभिज्ञान Quotes
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“प्रत्येक यादव गृहस्थ सुखी और सम्पन्न हुआ; और परिणाम जानते हो क्या हुआ?” कृष्ण ने सुदामा की ओर देखा। “क्या?” “वही जो प्रत्येक समर्थ और शक्तिशाली व्यक्ति और समाज के साथ होता है।” कृष्ण चिन्तित स्वर में बोले, “वे लोग अब स्वयं कंस बनने की ओर अग्रसर हैं।”
― अभिज्ञान
― अभिज्ञान
“दु:ख, पीड़ा और यातना में चेतना का स्वर मुखर होकर उसके सम्मुख आता है। मैंने कहा न कि सन्तुलन स्थापित करने के लिए प्रकृति ही प्रकृति के विरुद्ध लड़ रही है। अन्याय, दमन, शोषण तथा अत्याचार को समाप्त करने का आह्वान भी तो प्रकृति का ही आह्वान है।”
― अभिज्ञान
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“प्रकृति बाहर की घटनाओं में ही तो नहीं है। मनुष्य का मन, उसकी भावनाएं, उसकी चेतना—यह भी तो प्रकृति ही है।”
― अभिज्ञान
― अभिज्ञान
“एक कर्म कर व्यक्ति क्रिया-प्रतिक्रिया की श्रृंखला आरम्भ कर देता है। फिर वह स्वतन्त्र नहीं रह जाता। वह उस श्रृंखला में बंधता चला जाता है... क्या इसी को नियति कहते हैं? क्या नियत है—घटनाएं या नियम?”
― अभिज्ञान
― अभिज्ञान
“इस बार कृष्ण की मुस्कान प्राणों में समा जाने की शक्ति लेकर उनके अधरों पर आयी, “वह अन्त में होता है सुदामा! जब निष्काम उस सीमा पर पहुंच जाता है कि उसका फल किसी तरल पदार्थ के समान, अपने क्षेत्र से बहकर अन्य क्षेत्रों में भी जाने लगता है। उस पर तुम्हारा वश नहीं है। उसी फल के लिए तो कहता हूं, उसे प्रकृति की व्यवस्था पर छोड़ दो।” सुदामा”
― अभिज्ञान
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“व्यक्ति का कर्म एक अत्यन्त जटिल तथा सुनिश्चित व्यवस्था के भीतर होता है। कर्म किया जाता है तो इस व्यवस्था के सागर में एक छोटी-सी लहर उठाई जाती है। वह लहर अन्य किन लहरों को आन्दोलित करेगी, किन तटों तक किन-किन रूपों में पहुंचेगी। यह तुम नहीं जानते हो। इसलिए मैं उस व्यवस्था के सत्य की ओर से फल का आश्वासन देता हूं।”
― अभिज्ञान
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“अपनी दृष्टि साफ करो तो तुम भी पाओगे कि तुम इस सृष्टि से पृथक् नहीं हो। इसी सृष्टि का एक अंश हो तुम, इसी व्यवस्था का अंग हो। जब समझ लोगे कि तुम इस व्यवस्था से तनिक भी भिन्न हो न पृथक्, तो तुम भी इस प्रकृति के साथ पूर्ण तादात्म्य का अनुभव करोगे। प्रकृति तुम्हारे भीतर होगी और तुम प्रकृति के भीतर। प्रकृति की इस व्यवस्था से पूर्णतः एकाकार होने के समय में जो कुछ तुम कहोगे, वह वस्तुत: तुम नहीं कह रहे, वह प्रकृति कह रही है। तुम अपनी ओर से नहीं बोल रहे, प्रकृति और उसकी व्यवस्था की ओर से बोल रहे हो। ऐसे समय में तुम्हारे तर्क और तुम्हारे वचन, प्रकृति के तर्क और वचन हैं…।”
― अभिज्ञान
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“इसलिए मैं कहता हूं कि अपने जीवन, जीवन की आवश्यकताओं, अपनी स्वतन्त्रता और स्वाभिमान के लिए संघर्ष करने वाला, उनके लिए मर मिटने वाला व्यक्ति प्रकृति की आज्ञा का पालन करता है, वह सत्य के मार्ग पर है”
― अभिज्ञान
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“ऋषि भी तो संन्यासी हैं।” दर्शनाचार्य ने धीरे-से कहा। “उस दृष्टि से तो आप भी संन्यासी हैं। सुदामा भी संन्यासी हैं।” कृष्ण बोले, “जो धनार्जन की स्पर्धा में से अलग होकर अपनी आवश्यकता भर अर्जन कर सामाजिक कल्याण के लिए कार्य कर रहे हैं। हमारा कोई ऋषि जीवन को माया मान उससे विलग होकर नहीं बैठा।” कृष्ण कुछ क्षणों के लिए जैसे कहीं खो गये, “अब देखो, प्रत्येक जीव में अपने प्राणों के प्रति कैसी ममता है। कैसा भी निकृष्ट जीव क्यों न हो, कितनी भी शारीरिक असमर्थता उसमें हो, कैसी भी विकट परिस्थितियों में क्यों न हो…वह मरना चाहता है क्या?” “नहीं।”
― अभिज्ञान
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“अध्यात्म मेरी दृष्टि में सामाजिक चिन्तन है।” सुदामा बोले, “सामूहिक जीवन का चिन्तन । आध्यात्मिक जीवन स्वयं को वंचित नहीं, वितरित करता है। इच्छा, कामना अथवा आसक्ति से विच्छिन्न कर, विवेकपूर्वक यह सोचना सिखाता है कि सृष्टि में जो कुछ उपलब्ध है, वह किसी एक के लिए नहीं, सबके लिए है। परिणामतः प्रतिक्षण सचेत रहना पड़ता है कि हम संचय न करें, क्योंकि एक के द्वारा संचय, दूसरे को वंचित करता है।”
― अभिज्ञान
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“सीमा के पश्चात् ये सुख, सुख नहीं, रोग हैं। मनुष्य चाहे न समझे, किन्तु प्रकृति का नियम स्पष्ट है—आवश्यकता से अधिक भोग, शारीरिक और मानसिक आलस्य, रोग और अहंकार की ओर ले जाता है।”
― अभिज्ञान
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“सात्विक भक्ति में व्यक्ति सांसारिक इच्छाओं से मुक्त होता है; क्योंकि वह स्रष्टा को पाने के प्रयत्न में सम्पूर्ण सृष्टि के साथ तादात्म्य स्थापित करता है। वस्तुत: यह तादात्म्य भी और कुछ नहीं है, अपनी वैयक्तिक सीमाओं का, अतिक्रमण का, अपने विराट् अस्तित्व को पहचानने का प्रयत्न है; एक ऊंचे धरातल पर जीने का प्रयत्न, किन्तु भावना के धरातल तक की। इस दृष्टि से भक्ति एक अनुभूतिमात्र है।”
― अभिज्ञान
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“देखिये भाभी! मैं यह कह रहा था कि भक्ति एक भावना है, इसलिए उससे जो उपलब्धि होती है, वह भावनात्मक धरातल पर ही होती है। व्यावहारिक धरातल पर उपलब्धि के लिए कर्म के धरातल पर उतरना पड़ता है। देखिये! देवकी काकी कारागार में भी भक्ति ही करती रहीं, किन्तु अपनी किसी सन्तान को बचा नहीं पायीं; किन्तु काका ने जब गर्गाचार्य के माध्यम से नन्दबाबा से सम्पर्क किया, योजना बनायी और वासुदेव को लेकर कारागार से बाहर यमुना पार पहुंचाने का उद्यम किया तो वे बच गये और उन्हीं के हाथों अपने माता-पिता की ही नहीं, समस्त यादवों की मुक्ति हुई।” “तो”
― अभिज्ञान
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“उद्धव ने कृष्ण को बोलने नहीं दिया, “मैंने यह नहीं कहा कि राधा को कुछ नहीं मिला। राधा से पूछो कि उसे कृष्ण मिले या नहीं, तो उसका उत्तर होगा कि कृष्ण सदा मेरे पास हैं। वे मेरी आंखों में हैं, मेरे मन में हैं, मेरी आत्मा में हैं...” “इसे तुम प्राप्ति मानोगे?” सुदामा ने तुनककर पूछा। “पूरी बात तो सुनो भाई!” उद्धव अपने गम्भीर स्वर में बोले, “राधा के अनुसार तो उसे अपने मनभावन की प्राप्ति हो गयी है। उससे अधिक की उसे आकांक्षा भी नहीं है। पर दूसरी ओर हमारी रुक्मिणी भाभी हैं। वे भी कृष्ण की भक्ति करती हैं। पर उन्होंने केवल भक्ति ही नहीं की, उनकी कामना भावात्मक धरातल पर ही नहीं रही, वे सक्रिय हुईं। उन्होंने अपने भाई और पिता का विरोध किया।”
― अभिज्ञान
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“उद्धव की दृष्टि सुदामा पर टिक गयी, “मैंने बरसाने की राधा को कृष्ण की भक्ति करते देखा है। वह अपनी भक्ति में इतनी तन्मय है कि उसे देखकर कोई भी विहल हो जाता है। पर राधा को कृष्ण नहीं मिले।”
― अभिज्ञान
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“उद्धव बोले, “सुदामा उलझे हैं अपनी पोथियों में और हम कभी किसी युद्ध में, कभी युद्ध-परिषद् में...।”
― अभिज्ञान
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“कृष्ण प्रकृति की एक इच्छा—‘सृष्टि—को अर्पित हो गये होते, तो अत्याचार का विरोध कर प्रकृति में सन्तुलन स्थापित करने की ओर कैसे बढ़े होते-पर यह सब न उद्धव ने समझा है, न भैया बलराम ने, और न ही सुदामा समझेगा।”
― अभिज्ञान
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“जब एक किशोर, किसी किशोरी की किसी भंगिमा पर पिघल-पिघल जाता है, तो वह नहीं जानता कि प्रकृति उसके भीतर सृष्टि की कामना उत्पन्न कर रही है।”
― अभिज्ञान
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“क्या था यह सब? क्या सचमुच राधा अस्वस्थ थी और उसे इस क्षण विश्राम की आवश्यकता थी, या वह अस्वस्थता की आड़ में अपनी किसी अन्य इच्छा की पूर्ति कर रही थी...और स्वयं कृष्ण? वे सचमुच रोगी की शुश्रूषा कर रहे थे या स्पर्श के अनाम सुख का भोग..”
― अभिज्ञान
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“कृष्ण! जब शरीर अस्वस्थ हो या मन उदास हो, तो मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है। मन होता है, तुम मेरे पास ही बने रहो। क्षण को भी मुझसे अलग न हो।” कृष्ण कुछ नहीं बोले, चुपचाप राधा को देखते रहे। राधा खिसककर उनके पास आ गयी। उसने उनके कन्धे पर अपना सिर टिका दिया, “कृष्ण! मैं नहीं जानती कि यह सब क्या है। मैं क्यों तुम्हारे ही पास रहना चाहती हूं। क्यों मैं तुमसे ही बातें करना चाहती हूं। क्यों मैं चाहती हूं कि अन्य सब लोगों से अलग कर, तुम्हें अपने पास रख लूं । तुम किसी और के न रहो, केवल मेरे ही रहो...।” राधा के लिए वैसे बैठना असुविधाजनक हो रहा था। उसने अपना सिर कृष्ण की गोद में रख दिया...”
― अभिज्ञान
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“दूसरे की वाग्दत्ता होने का राधा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। वह उन बाल-सखियों के रूप में ही उनसे मिलती थी। सार्वजनिक रूप से नृत्य में सम्मिलित होती थी। कृष्ण को चिढ़ाती और खिजाती थी, पर एकान्त होते ही गम्भीर हो जाती थी। वह अपने मन की बहुत सारी बातें कृष्ण से करती थी।”
― अभिज्ञान
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“राधा के साथ नाचते हुए कृष्ण ने पहली बार स्त्री-स्पर्श का रोमांच जाना था। उन्हें पहली बार लगा था कि जो कृष्ण अब तक सबको प्यार करता था, वह कुछ बदल गया है। राधा के प्रति उसका आकर्षण सबके प्यार में नहीं समाता। राधा के साथ बातें करने का उनका मन होता है, पर भीड़ में नहीं। एक राधा ही है, जिसके साथ वे एकान्त चाहते हैं...पर राधा ने बड़े सहज भाव से उन्हें बता दिया था कि अय्यन गोप के साथ उसका विवाह होने वाला है। वह अय्यन की वाग्दत्ता है।”
― अभिज्ञान
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“बरसाने से आयी वृषभानु की बेटी राधा मिली थी। राधा उनसे तीन-चार वर्ष बड़ी रही होगी। बड़ी आकर्षक और चंचल लड़की थी। जब आवश्यकता पड़ती, बड़े होने का रौब झाड़ लेती, और जब इच्छा होती, समवयस्क अथवा छोटी सखी बन कृष्ण से अपना अनुरोध मनवा लेती”
― अभिज्ञान
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“सबसे पहले कुछ भिन्न अनुभव हुआ था, जब रूपा भाभी की चहेती माधवी ने एक दिन राह किनारे रोक, उनके बहुत निकट आ, उनके कन्धे पर हाथ रखकर कहा था, “कृष्ण! मैं तुमसे प्रेम करती हूं।” माधवी कृष्ण को अच्छी लगती थी। बहुत सुन्दर थी माधवी। पर रूपा भाभी जैसी नहीं। कृष्ण हंस पड़े थे, “मैं भी तुमसे बहुत प्रेम करता हूं माधवी दीदी!” और जाने कैसे कृष्ण ने जोड़ दिया, “मैं तो रूपा भाभी से भी बहुत प्यार करता हूं।”
― अभिज्ञान
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“कृष्ण ने उन्हें सदा भाभी ही कहा। उन्हें देखते ही कृष्ण के मन में प्रसन्नता का जैसे कोई उत्स फूट पड़ता; और प्रसन्नता ऊर्जा बन जाती। रूपा भाभी को देखते ही कृष्ण इतने वाचाल और चंचल हो उठते थे कि उन्हें भय होता कि कहीं कोई अटपटी बात न कह डालें। पर वे अपनी उस ऊर्जा का क्या करते। मन होता, बांसुरी में कोई आह्वादक राग छेड़ दें, या फिर जोर से नाचने लगें। रूपा भाभी एक बार मुस्कराकर उनसे कोई बात कर लेतीं तो वे धन्य हो जाते और यदि वह अपना कोई काम कह देतीं तो कृष्ण कृतकृत्य हो जाते। उन्हें लगता कि उनके जीवन का वह एक दिन सार्थक हो गया है… तब”
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