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कस्तूरी मृग Quotes
कस्तूरी मृग
by
Shivani103 ratings, 4.18 average rating, 4 reviews
कस्तूरी मृग Quotes
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“तिमिल के एक घने छायादार वृक्ष”
― कस्तूरी मृग
― कस्तूरी मृग
“लड़कों के गले कितने ही सुरीले क्यों न हों, मसें भीगीं कि सातों स्वर उनके गले से एकसाथ निकल पड़ते हैं।”
― कस्तूरी मृग
― कस्तूरी मृग
“यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरीतिकी,”
― कस्तूरी मृग
― कस्तूरी मृग
“चम्पक उँगलियों का स्पर्श पाते”
― कस्तूरी मृग
― कस्तूरी मृग
“एक तो पहाड़ की सुन्दरी शाहनियों का दूधिया रंग, उस पर अपने पिता गौरीलाल शाह की-सी ही यूनानी नाक की खड्ग की धार पर हीरे की लौंग”
― कस्तूरी मृग
― कस्तूरी मृग
“उसने स्कार्फ को यत्न से खोलकर ऐसे तहाया, जैसे बहुमूल्य किमखाब का टुकड़ा हो,”
― कस्तूरी मृग
― कस्तूरी मृग
“सहोदरा जब कभी शत्रु बन उठते हैं, तो उनकी शत्रुता हृदयहीन अनात्मीय शत्रु की शत्रुता से भी अधिक घातक होती है। वह शत्रुता फिर क्षमा-शीलता, औदार्य या पश्चात्ताप, किसी को नहीं पहचानती।”
― कस्तूरी मृग
― कस्तूरी मृग
“रवीन्द्रनाथ की एक कहानी में पढ़ा था, नारी को आमतौर पर तीन वस्तुएँ विशेष रूप से प्रिय होती हैं—कच्ची अमिया, तीखी तेज़ मिर्च और कठोर पति। शायद यही कारण था कि रम्भा अपनी गृहस्थी में इतनी सुखी-सन्तुष्ट थी।”
― कस्तूरी मृग
― कस्तूरी मृग
“जितना ही उग्र नलिनी का क्रोध होता, उतनी ही शान्त निरुद्वेग रहती थी उसकी दृष्टि और उतना ही संयत रहता था उसका आचरण।”
― कस्तूरी मृग
― कस्तूरी मृग
“नवीन सखी को यूनान के प्राचीन मन्दिरों के वैभव-द्वार खोलती समझाने लगती—डोरिक, आयोनिक, और नलिनी मिश्रा उसे भारतीय वास्तु-विकास का इतिहास पढ़ाती—ध्वज-स्तम्भ, कीर्ति-स्तम्भ, स्कन्दकान्त, पद्मकान्त, विष्णुकान्त।”
― कस्तूरी मृग
― कस्तूरी मृग
“राग-विस्तार के बीच रियाज करनेवाली पंचम से शुद्ध गांधार में ऐसे पटीयसी कौशल से उतरी कि लगा शुद्ध कल्याण का आँचल थाम रही है। यही तो मेरे पिता भी किया करते थे। ऐसे ही चतुर नट के कौशल से, वे मीड़ों की डोर थाम, शाखामृग-से एक राग से दूसरे राग की शाखा-प्रशाखा पर कूदते श्रोताओं को मुग्ध कर देते थे।”
― कस्तूरी मृग
― कस्तूरी मृग
“विधाता जिस उदारता से देता है वैसी ही कृपणता से सबकुछ छीन भी लेता है”
― कस्तूरी मृग
― कस्तूरी मृग
“मेरी नींद बड़े भोर घोष बाबू के मंद्रसप्तकी रियाज से ही टूटती थी। जैसा ही गरम गला था, वैसा ही नरम मिजाज। घोर कृष्णवर्गी अमावसी रंग, गोल-मटोल चेहरे पर सब समय लगी अलमस्त दूधिया हँसी और बहुत बड़ी-बड़ी लाल डोरीदार आँखें। बातें करने का ढंग भी परिहासपूर्ण। “घोष बाबू, आपके घर में और कोई नहीं है?” मैंने एक दिन पूछ दिया। “अरे, घर ही नहीं हे बाबा, तो कोई के केहाँ से होगा, गिन्नी (पत्नी) होता तो हमको फजीर में रियाज करने देता?”
― कस्तूरी मृग
― कस्तूरी मृग
