ढाई घर Quotes
ढाई घर
by
Giriraj Kishore32 ratings, 4.59 average rating, 4 reviews
ढाई घर Quotes
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“तुम्हें जल्दी-से-जल्दी ज़िन्दगी में सेटिल हो जाना चाहिए, आदर्शवाद में कुछ नहीं रखा। ये सब सवाल जो तुम्हें घेरे हैं इन्सान को आदर्शवादी और अव्यावहारिक बना देते हैं। तब आदर्श मूल्य था, अब मूर्खता है। अब देश को आदर्शवाद की ज़रूरत नहीं, सही अवसर की ज़रूरत है।”
― ढाई घर
― ढाई घर
“अपने सवालों का जवाब नहीं पा सका। हमेशा बने रहने और छोड़ जाने के बीच झूलता रहा। अब वह कहता है कि यही हमारी पीढ़ी की नियति है। हम इस अनिश्चय के साँप को न मार सकते हैं और न पाल सकते हैं। हमारे अन्दर पलता यह भूखा सर्प—अपनी चिरी हुई जीभ से अन्दर-से-अन्दर निरन्तर चाट रहा है—अब ज़्यादा समय नहीं—यह चाट जायेगा और हम कुछ नहीं कर पायेंगे।”
― ढाई घर
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“जीतकर तो लौटा ही जाता है हारकर लौटना भी लौटना ही कहलाता है। भले ही स्वागत योग्य न हो, पर यह कहना ग़लत होगा कि वह सम्मानजनक नहीं।”
― ढाई घर
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“जब मन्नत पूरी होती थी तो शीरनी चढ़ती थी। एक खिदमतगार उस मज़ार की रोज़ झाड़-पोंछ करता था।”
― ढाई घर
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“तुख्मी, दशहरा, मालदा, लँगड़ा, फ़जली, गुलाब पसन्द, बादशाह पसन्द, तोता परी, सफ़ेदा—न जाने कितनी आम कि किस्में थीं।”
― ढाई घर
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“लगता था कि हमारा श्रेष्ठता का भाव और खानदानवाद उनके किसी भी कदम को स्वीकार नहीं करता। चाहे वह रिश्ता हो या जीवन-दर्शन। सोना”
― ढाई घर
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“जैसे ही खर्चे का दबाव बढ़ा वैसे ही ज़मीन निकाल दी। अब लगता है धरती की जितनी अवमानना ज़मींदारों ने की उतनी शायद लुटेरों ने भी न की हो। धरती न माँ थी और न आर्थिक साधन।”
― ढाई घर
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“अमीरी से ग़रीबी में लौटना ज़्यादा तकलीफ़देह होता है। तकलीफ़देह से ज़्यादा शर्मनाक। हालाँकि ग़रीबी का शर्मनाक लगना भी शर्मनाक है। यह बात मैंने तब जानी जब तंगदस्ती ने मुझे घेर लिया। हालाँकि वह तंगदस्ती तंगदस्ती ही थी,”
― ढाई घर
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“दादा जी, विशिष्ट होना भी अपने आप में एक दाग़ है जो दूर से ही चमकता है और दूसरों को आतंकित करता है।”
― ढाई घर
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“पुरानी रिवायतों से कटकर कोई नया नहीं होता। नये यानी आधुनिक के लिए वे जदीद शब्द का प्रयोग करते थे। परम्परा ही आगे देखने की नज़र देती है।”
― ढाई घर
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“यह आज़ादी गाँधी के पसन्द की आज़ादी नहीं है। यह ‘न्यू फ्यूडल्स’ की आज़ादी है जो बात कॉमन मेन की करते हैं लेकिन अपने आपको विशिष्ट बनाये रखना चाहते हैं।”
― ढाई घर
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“जब सिक्का खोटा हो जाता है तो उसे वापिस टकसाल में चला जाना चाहिए। नहीं तो जिसके हाथ पड़ता है वही उछालकर देखता है और फिर फेंक देता है।”
― ढाई घर
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“यह ज़माना एक आत्मसम्मानी व्यक्ति के लिए शारीरिक आत्महत्या का न सही पर सामाजिक रूप से अपने को समेट लेने का है।”
― ढाई घर
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“तुमने एक औरत का खून किया और वह भी उसका जो बेसहारा थी—उसका सहारा तुम खुद थे। अमानत में खयानत करके तुमने मुझे बहू के सामने मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा।”
― ढाई घर
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“धीरे-धीरे बुदबुदा रहे थे—लोग समझते हैं बड़े लोग कितने सुखी हैं—सबको उनके अपने अन्तर्विरोध ही नष्ट करते हैं।”
― ढाई घर
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“किसी का कोई दोष नहीं। मैं अपने बाँधे बन्धन को नहीं तोड़ पाया और न वक़्त के साथ ही बदल सका। जिनकी लचक खत्म हो जाती है वे टूट जाते हैं। हर नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से ज़्यादा आज़ाद और आगे होती है। हम ही उसे घसीटने की कोशिश करते हैं। वह तो पीछे की तरफ़ नहीं झुक पाती, हम ही उसे घसीटते-घसीटते खुद गिर पड़ते हैं तब कोई उठाने वाला नहीं मिलता—! उस”
― ढाई घर
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“जब पहाड़ी झरना पहाड़ की सीमा के बाहर होकर बहता है तो उसे रोका नहीं जा सकता। उसके लिए पहाड़, पठार और ज़मीन सब रास्ता छोड़ते चले जाते हैं। जहाँ नहीं छोड़ते वहाँ वह खुद रास्ता बना लेता है। भले ही उसे कुछ समय के लिए अवरुद्ध होना पड़े।”
― ढाई घर
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“यह गाँधी जो मिट्टी के लेप के ज़रिये बीमारियों का इलाज करता है, बकरी का दूध पीता है—सिर्फ़ चरखा चलाकर अँग्रेज़ जैसी ताक़त से मुल्क़ आज़ाद करा लेगा?”
― ढाई घर
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“गाँधी जी की हत्या तो उसी दिन हो गयी थी जिस दिन देश बँटा। देश बाँटने वाले भी गोडसे से कम नहीं थे। हमारे यहाँ भी बड़े राय धीरे-धीरे अशक्त हो रहे थे। उनके देखते-देखते सब कुछ बँट गया था। घर हो या देश जब घर का बड़ा चाहता है कि सब जुड़े रहें और सब कुछ बँट जाता है, तो जीने या मरने के बीच कोई खास दूरी नहीं रहती। देश बँट गया था। गाँधी मर गये थे। सत्ता में बैठे लोग सत्ता को देसी आम की तरह चूसने में संलग्न थे।”
― ढाई घर
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