Professor Ki Diary Quotes
Professor Ki Diary
by
Dr. Laxman Yadav58 ratings, 3.76 average rating, 8 reviews
Professor Ki Diary Quotes
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“बदलाव की लड़ाई अकादमिक लोग नहीं लड़ेंगे तो समाज के बीच उनकी ज़िम्मेदारी क्या होगी?”
― Professor Ki Diary
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“अगर आप किसी समाज को ग़ुलाम बनाना चाहते हैं तो उसमें हर तरह के प्रतिरोध की गुंजाइशों को कुचलना होता है।”
― Professor Ki Diary
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“क़लम और किताब जिस जगह आकर साथ छोड़ देती है, उसके आगे का सफ़र किसी आशीर्वाद के ज़रिए ही तय होता है वरना डूब जाओगे।”
― Professor Ki Diary
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“बदलाव भीतरी संरचना में भी आ रहा है और बाहरी नुमाइश में भी।”
― Professor Ki Diary
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“खेलोगे कूदोगे होगे ख़राब, पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब’। अफ़सरशाही का पैसा और पॉवर ढहते हुए नवाबी का नया रूप ही तो है।”
― Professor Ki Diary
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“इससे अच्छा तो मैं यूपीएससी की ही तैयारी कर डालूँ। कम से कम इम्तिहान के ज़रिए ख़ुद के भरोसे क़ामयाब होने की गुंजाइश तो रहेगी।”
― Professor Ki Diary
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“देखना चाहें तो दिल्ली में ही आपको सैकड़ों नाकामयाब थॉमस अल्वा एडिसन मिल जाएँगे जो आज भी अपने सौवें बल्ब के जल जाने के इंतज़ार में इंटरव्यू पर इंटरव्यू दिए जा रहे हैं। वे इंटरव्यू के वक़्त ही जमाने को नज़र आते हैं, फिर अगले इंटरव्यू तक कहीं खो जाते हैं। एक अदद नौकरी दिलाने में फेल उनकी डिग्रियाँ सब कुछ जानते हुए भी उन्हें हर इंटरव्यू तक खींच लाती हैं। उनको अकादमिक दुनिया में कौन खोजता है? बाकी वक़्त वे कहाँ कैसे जीते हैं? किसे पता।”
― Professor Ki Diary
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“शिक्षक उस वैद्य की तरह है, जिसे अपने विद्यार्थी के लिए ज़िंदगी की बेतरतीब वनस्पतियों में से ज्ञान व विवेक की औषधि को पहचानने की कला सिखाना है।”
― Professor Ki Diary
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“जिस पाँव के नीचे गर्दन दबी हो, उस पाँव को सहलाना ही समझदारी है।’ ठेके पर रखे गये लोग ऐसे”
― Professor Ki Diary
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“रीढ़ बुरी चीज़ है, क़ामयाब होने की शर्तें इसे झुकाती हैं। मगर जब तक ये बची रहती है, धनुष की प्रत्यञ्चा की तरह तनी रहती है। लचकदार होते ही आप हर कहीं ‘फिट’ हैं।”
― Professor Ki Diary
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“पता है, क़लम-किताब ने मेरे लिए आज ज़िंदगी का नया अध्याय लिख दिया। आज का दिन मेरे लिए ऐसा रहा गोया भूमिहीन मज़दूर के हिस्से ज़मीन का टुकड़ा आ गया हो।”
― Professor Ki Diary
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“ओढ़े गये चेहरों के दौर में आईनों के इम्तिहान ही सबसे मुश्किल होते हैं।”
― Professor Ki Diary
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“बचपन में सबसे छुपकर आईना देखा करता था। जैसे हर बार अपने चेहरे में किसी और का चेहरा खोजता।”
― Professor Ki Diary
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“सैलरी से लौटाने वाली बात आइंदा मत करना। क्या-क्या और कितना लौटा सकोगे? बस एक बात याद रखना, पैसा कमाने से पहले पैसा खर्च करने आना चाहिए।”
― Professor Ki Diary
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“उन्हीं में से एक थे डॉ. जितेंद्र सिंह। मेरे नमस्ते के जवाब में मुस्कुराते हुए जितेंद्र सर ने हाथ मिलाया। वे आशीर्वाद वाली मुद्रा में नहीं आये। सहज होते हुए मैंने कहा- ‘धन्यवाद सर।’ वे बोले- ‘सर नहीं, जितेंद्र हूँ मैं। अगर आप मुझे मेरे नाम से बुलाएँगे तो अच्छा लगेगा।’ यह सुनकर मेरी रीढ़ की हड्डी में थोड़ी और सख़्ती आयी। दरअसल कमलवत चरणों में दंडवत करने को ही सम्मान बताते हैं लोग। पैर छूने पर डाँटने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर सत्यप्रकाश मिश्र सर अकेले संस्कार थोड़े न बदल देते! उम्र”
― Professor Ki Diary
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“हमें भारी ग़लतफ़हमी थी कि सामंतवाद इलाहाबाद, बनारस, पटना जैसे ‘छोटे’ शहरों तक ही साँस लेता होगा। पढ़े-लिखे लोग भी जातिवाद, क्षेत्रवाद, सामंतवाद, पितृसत्ता जैसे ‘संस्कारों’ से कहाँ उबर पाते हैं? जहाँ गये, बीज बोया और फिर क्या... कुंठा और अहं की फसल लहलहाने लगी।”
― Professor Ki Diary
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“इन कैम्पसों के दरकने पर सबसे गहरा दर्द हमें ही होता है। ऐसे विश्वविद्यालयों को कमज़ोर करने वाले वही लोग हैं, जिन्हें समाज के वंचित-शोषित जमात को मिले मौक़ों से एतराज़ होता है। दरअसल तालीम हर दौर में सत्ता को चुभती है। तालीम, नयी नस्लों को सवाल करने की ताक़त देती है। हमने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डिग्री ही नहीं, मुकम्मल तालीम हासिल की। इसलिए हमें अहसास है कि ऐसे तालीमी-इदारों को बचाना दरअसल पीढ़ियों को बचाना है।‘जितनी शाखाएँ उतने वृक्ष’ यह हमारे इलाहाबाद विश्वविद्यालय का मोटो है।”
― Professor Ki Diary
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“ऐसे सरकारी डिग्री कॉलेज मैंने अब तक नहीं देखे थे। हमारे जिले के अधिकांश सरकारी स्कूल-कॉलेज लावारिस मवेशियों से लेकर लावारिश ख़्वाबों की पनाहगाह बने खंडहरों से ज़्यादा कुछ नहीं लगते। उन ‘खंडहरों’ में भारत के भविष्य गढ़े जा रहे हैं। जाने किस भारत का कैसा भविष्य?”
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“लहलहाती फ़सल की उम्मीद में अपना सब कुछ झोंक देने वाले एक किसान की तरह”
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“हर मास्टर एक दिल भी रखता है; जो परिवार, जाति, भाषा, क्षेत्र, पार्टी या विचारधारा देखकर धड़कता है।”
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“तीन सौ साल पुराना तालीमी-इदारा।”
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“प्रोफ़ेसर का मतलब हमारे लिए समाज की वह रीढ़ था जो रीढ़ वालों को पैदा करता है।”
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“वह किसी भी मसले को समग्रता में देखते हैं। बाबाई नूर है उनमें।”
― Professor Ki Diary
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