“एकाग्र: प्रयतो भूत्वा, इमं मंत्रमुदीरयेत्
ओम नमो भगवते वासुदेवाय।
अवशेनापि यन्नाम्नि कीर्तिते सर्वपातकै:।
पुमान् विमुच्यते सद्य: सिंहत्रस्तैर्मृगैरिव॥ विवशता से फैली हथेली में मुँदा जल झरझराकर फिर संगम के नीलाभ जल में एकाकार हो गया।”
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Shivani,
कृष्णकली