काशी का अस्सी Quotes

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काशी का अस्सी (Kashi ka Assi) काशी का अस्सी by Kashinath Singh
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“सिद्धान्त सोने का गहना है ! रोज-रोज पहनने की चीज नहीं ! शादी-ब्याह तीज-त्योहार में पहन लिया बस ! सिद्धान्त की बात साल में एक-आध बार कर ली, कर ली; बाकी अपनी पालिटिक्स करो ।” उम्मीद”
Kashinath Singh, kashi ka assi
“उनका एक जीवन-दर्शन था–‘जो पठितव्यम् तो मरितव्यम्, न पठितव्यम् तो मरितव्यम्, फिर दाँत कटाकट क्यों करितव्यम् ?”
Kashinath Singh, Kashi Ka Assi
“ऐ दुनियावालों! वह पलना लकड़ी है जिसपे बचपन में सोए थे! वह गुल्ली डंडा लकड़ी है, जिससे खेले थे! वह पटरी भी लकड़ी है जिसे लेकर स्कूल गए थे! वह छड़ी भी लकड़ी है जिससे मुदर्रिस की मार खाई थी! ब्याह का पीढ़ा भी लकड़ी है जिसपर ब्याह रचाया था! सुहाग की सेज भी लकड़ी है जिसपर दुल्हन के साथ सोये थे! बुढ़ापे का सहारा लाठी भी तो लकड़ी ही है!
ऐ दुनियावालों! अंतकाल जिस टिकटी पर मसान जाते हो, और जिस चिता पर तुम्हें लिटाया जाता है-सब लकड़ी है!
यह संसार कुछ नहीं, सिर्फ लकड़ी का तमाशा है!”
Kashinath Singh, काशी का अस्सी
“जो मज़ा बनारस में, न पेरिस न फ़ारस में।
'गुरु' यहाँ की नागरिकता का सरनेम है। न सिंह, न पांडे, न जादो, न राम! सब गुरु ! जो पैदा भया, वह भी गुरु, जो मरा, वो भी गुरु!”
Kashinath Singh, काशी का अस्सी
“बड़े-बुजुर्ग’ का मतलब घर का ऐसा सदस्य जिसकी सलाह या आदेश को बकवास समझा जाए, जिस पर ध्यान देने की जरूरत न समझी जाए ! जैसे अगर वह चिल्लाए कि ‘अरे देखो ! बैला खूँटा तुड़ा के भागा जा रहा है, पकड़ो उसे’ या ‘गैया को नाँद से हटाकर नीम की छाँह में बाँध दो’ तो लड़के-बच्चे ताश खेल रहे हों तो खेलते रहें ! यानी, वह जो अपने जीते-जी फालतू हो जाए !”
Kashinath Singh, Kashi Ka Assi
“लेकिन देश जहाँ-का-तहाँ नहीं था । मुहल्लेवालों को दाल खाए दो महीने हो गए थे । गेहूँ और कोयला-दोनों एक भाव बिक रहे थे । यानी ढाई रुपए किलो, चाहे कोयला खाइए, चाहे गेहूँ !”
Kashinath Singh, Kashi Ka Assi
“अगर आप उन्हें काम नहीं दे सकते, रोजगार नहीं दे सकते, अगर वे किसी से कुछ माँगते नहीं, छीनते नहीं, तीन-तेरह नहीं करते, अगर वे किसी का कुछ बिगाड़ते नहीं और जिस हाल में हैं उसी हाल में अपनी हँसी हँसते हैं तो आपको तो निश्चिन्त और खुश होना चाहिए”
Kashinath Singh, kashi ka assi
“जिन्दगी गुजरी थी चौराहे पर, फुटपाथ पर, घाट पर, ‘बहरी अलंग’ में । काम चलाया एक गमछा और लैंगोट में । बालू और माटी से अच्छा कौन सा साबुन है, वही पोता और घंटों साफा पानी दिया । रुपए-पैसे हाथ की मैल थे, करतार का दिया हुआ ‘चना चबेना गंगजल’ छत्तीसों प्रकार के व्यंजन । ‘कछु लेना न देना, मगन रहना’ उनकी जीवन बूटी था । मस्ती उनकी जिन्दगी थी और हँसी साँस । बड़े-से-बड़ा ओहदा, बड़ी-से-बड़ी कोठी, बड़ा-से-बड़ा लाट गवन्नर पसम बराबर”
Kashinath Singh, kashi ka assi
“मन्दिर की घंटियों और चपुओं और पानी के हिलकोरों की आवाजें और मछलियों की उछाल की चमक”
Kashinath Singh, kashi ka assi
“कवन देस का राजा अच्छा, कवन देस की रानी ? अरे कवन देस का राजा अच्छा, कवन देस की रानी ? कवन देस का कपड़ा अच्छा, कवन देस का पानी ? जोगीड़ा सारा रा, जोगीड़ा सा रा रा रा... कानपूर का कपड़ा अच्छा राजघाट का पानी । अरे, रामनगर का राजा अच्छा इटलीगढ़ की रानी : जोगीड़ा सारा रा रा...”
Kashinath Singh, kashi ka assi
“बभना बेदरदी दरदियो न जाने जोड़त गाँठ हमारी । उमर अबहीं पोरी बारी... टूटल गाँव नगर से नाता, छूटल महल अँटारी । विधि गति वाम कछु समुझि परे ना बैरन भइ महतारी । उमर अबहीं मोरी... नदिया किनारे बलस मोर रसिया, दी घूंघट पट डारी । (टिप्पणी : अय हय हय हय ! बलम मोर रसिया, क्या बात है !) चार जरा मिलि डोली उठावें, घरवा से देत निकारी उमर अबहीं मरी बारी... कहत कबीर सुनो भई साधो, छमियो चूक हमारी, अबकी गवना बहुरि नहिं अवना मिलिलेहु भेंट अँकवारी ।”
Kashinath Singh, kashi ka assi
“आई गवनवाँ की सारी उमर अबहीं मोरी बारी, साज समाज पिया लै आए, अउर कहंरवा चारी ।”
Kashinath Singh, kashi ka assi