सोमनाथ [Somnath] Quotes

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सोमनाथ [Somnath] सोमनाथ [Somnath] by आचार्य चतुरसेन
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“राज-काज में अनुरोध मानकर शासन करने की मेरी आदत नहीं।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“अविवेक के सम्मुख विवेक नहीं चलता। जहाँ अविवेक है वहाँ विवेक सावधान रहता है।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“इस प्रकार अपनी दोनों योजनाओं को कार्यान्वित कर तथा अमीर को निष्कंटक करके दुर्लभदेव ने अपना तीसरा नेत्र अब पाटन की ओर फेरा। उसके लिए जिन लोगों ने विपित्ति मोल ली थी, उनकी उस स्वार्थी ने चिन्ता नहीं की। उसे केवल अपनी माता महारानी दुर्लभदेवी को जैसे बने, महाराज का मन फेर कर सिद्धपुर ले आने और मन्त्री विमलशाह को समझा-बुझाकर जैसे बने, अपने पक्ष में करने की व्यग्रता थी।”
आचार्य चतुरसेन, सोमनाथ
“उसने अपनी मृणाल-कोमल भुज-वल्लरी गुर्जरेश्वर के कण्ठ में डाल दी।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“ज्योतिर्लिंग के भग्न खण्ड, धन-रत्न भण्डार साथ ही अमीर ले गए थे।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“मैं केवल यही चाहती हूँ कि तू अभी, इस देवपट्टन से चला जा और अब अधिक विनाश न कर! और जान रख, कि तू जैसे खुदा का बन्दा है वैसे ही और सब लोग भी हैं। वे सब तेरे भाई हैं महमूद, उन्हें प्यार कर, तेरी नामवर तलवार उनकी रक्षा के लिए है, उनकी गर्दन काटने के लिए नहीं।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“बहुत लोग मुझसे अपने राज्य और दौलत के लिए लड़े। लेकिन इन्सान के लिए आज तक मुझसे कोई नहीं लड़ा। मैं खुदा का बन्दा महमूद, वही कहूँगा जो मुझे कहना चाहिए। यह औरत, जो मेरे सामने खड़ी है, उसने मुझे एक नई बात बताई है, जिसे मैं नहीं जानता था। इसके हाथ में तलवार नहीं है, तलवार का डर भी इसे नहीं है। यह रोती और गिड़गिड़ाती भी नहीं। बादशाहों के बादशाह महमूद को फटकारती है, इन्साफ के प्यार ने इसे इस कदर मज़बूत बनाया है। इसके आँसुओं का मोल तमाम दुनिया के हीरे-मोतियों से भी नहीं चुकाया जा सकता। इसने महमूद को माँ की तरह नसीहत दी है और अब मैं महमूद, खुदा का बन्दा, वही कहूँगा जो मुझे कहना चाहिए। दो सौ घुड़सवार जिनकी सरदारी फतह मुहम्मद करेगा, इज़्ज़त के साथ बादशाहों के बादशाह की माँ को इसके घर तक पहुँचा दें और उसका हर एक हुक्म बजा लाएँ। महमूद इस औरत”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“माँ है, माँ के बिना महमूद पैदा ही न हो सकता था। फिरदौसी, अलबरूनी, अरस्तू, शेख सादी, ये सब माँ के बच्चे हैं। अय माँ, आगे बढ़, और इस बच्चे के सिर पर हाथ रखकर इसे दुआ बख्श, जिसने तीस वर्ष तक धरती को अपने पैरों से कुचलकर उसे लोहू से लाल किया है।’’ दो”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“तू भगवान के पुत्रों को मारता है, जिन्होंने तेरा कुछ नहीं बिगाड़ा। उन्हें लूटता है और उनके घर-बार जलाता है। तू कंकड़-पत्थरों का लालची है, और आदमी का दुश्मन है। तेरा खुदा यदि तेरी इन काली करतूतों से खुश है, तो वह खुदा नहीं, शैतान है।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“मै तुझसे यह पूछती हूँ, कि क्या तुझसे किसी ने यह नहीं कहा कि तू मृत्यु का दूत, जीवन का शत्रु और मनुष्यों में कलंक रूप है?”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“ज़र-जवाहर के लालच से इस्लाम के बन्दों का खून बहाने मैं यहाँ नहीं आया हूँ। मैं मूर्तिपूजकों के धर्म का तिरस्कर्ता, मूर्तिभंजक महमूद हूँ, बुतपरस्ती के कुफ्र को दूर करना मेरा धर्म है। मैं मूर्ति बेचता नहीं, मूर्तियों को तोड़कर अल्लाताला खुदा के पैगम्बर मुहम्मद की आन कायम करता हूँ।’’ इतना कहकर उसने अपने हाथ की रत्नजटित सुनहरी छड़ी से तीन बार उस भग्न ज्योतिर्लिंग पर आघात किया और सब मूर्तियों तथा महालय को तोड़ने-फोड़ने का हुक्म दिया। देखते-ही-देखते उसके हज़ारों बर्बर सैनिक महालय की मूर्तियों, महराबों और तोरणों को तोड़ने-फोड़ने और ढाने लगे।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“उन्होंने ज्योतिर्लिंग पर अपना हिमधौत सिर रख दिया। अमीर ने गुर्ज का भरपूर वार किया। सर्वज्ञ का भेजा फट गया। और उनके गर्म रक्त से ज्योतिर्लिंग लाल हो गया। उनके मुँह से ध्वनि निकली, ‘‘ओ३म्’’, और प्राण-पखेरू ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर उड़ गए। अमीर ने गुर्ज का दूसरा वार और फिर तीसरा वार किया। ज्योतिर्लिंग के तीन टुकड़े हो गए।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“ज्योतिर्लिंग के निकट जाकर उसने कहा, ‘‘मैं खुदा का बन्दा महमूद वही कहूँगा जो मुझे कहना चाहिए। अय बुजुर्ग, दूर हट जा और बुत–शिकन को कुफ्र तोड़ने दे।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“रत्न-मण्डप के मणिजटित खम्भों पर अस्तंगत सूर्य की रंगीन किरणें झिलमिला रही थीं। उस अप्रतिम मणिमय प्रासाद को देखकर अमीर आश्चर्य से जड़ हो गया। सहमते हुए, वह गर्भगृह में घुसा। उसने देखा घृत के दीपक अपनी पीली आभा और सुगन्ध बिखेर रहे थे। और नितान्त शान्त वातावरण में गंग सर्वज्ञ स्वर्ण-थाल हाथ में लिए देवाधिदेव सोमनाथ की आरती उतार रहे थे। क्षण-भर अमीर भाव-विमोहित-सा मुग्ध खड़ा रहा। कुछ देर बाद उसने सतेज स्वर में कहा, ‘‘यहाँ कौन है?’’ ‘‘मैं और मेरा देवता’’, गंग ने शान्त स्वर में कहा। फिर बिना ही अमीर की ओर मुँह फेरे उन्होंने कहा, ‘‘वत्स महमूद, कुछ क्षण ठहर जा।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“तुमने सिर्फ शोभना के लिए ही धर्म त्यागा न?’’ ‘‘जी नहीं, मैंने धर्म कबूल किया।’’ ‘‘मेरा मतलब हिन्दू धर्म से है।’’ ‘‘वह धर्म नहीं, कुफ्र है, धर्म तो सिर्फ इस्लाम है।’’ ‘‘इस्लाम में तुम्हें कुछ मिला?’’ ‘‘जी हाँ–समानता, उदारता, जीवन, आशा, आनन्द और दौलत।’’ ‘‘और शोभना?’’ ‘‘वह भी।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“इन तलवारों के पीछे दासता, घमण्ड, स्वार्थ, दुराचार, पाखण्ड जो छिपा हुआ है। ये एक लाख तलवार अमीर की उस अकेली तलवार का भी मुकाबला नहीं कर सकतीं जो केवल एक ईश्वर को मानता है, जिसका एक धर्म, एक जाति, एक ईश्वर और एक ईमान है–जहाँ छोटे-बड़े सब बराबर हैं।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“सर्वज्ञ ध्यानस्थ हो देवता के सम्मुख खड़े रहे। फिर स्थिर कण्ठ से कहा, ‘‘आगे बढ़ो युवराज, और तुम भी चौला।’’ दोनो ज्योतिर्लिङ्ग के निकट अन्तरायण में जा खड़े हुए। वहाँ एकाएक चौला का हाथ भीमदेव के हाथ में देकर उस पर मंत्रपूत जल और बिल्व-फल रख सर्वज्ञ ने कहा, ‘‘पुत्र भीमदेव, आज तुम देवाविष्ट सत्व हो–तुम्हारी सेवा के लिए यह देवदासी चौला मैं तुम्हें अर्पण करता हूँ। यह तुम्हारे ही समान उच्च वंशोद्भव राजकुल की कन्या है। इसकी रक्षा और सम्मान करना। और पुत्री चौला, यह साक्षात् शिवरूप सत्व भीमदेव तेरी श्रद्धा, पूजा और सेवा का पात्र है, इसी के माध्यम से तू अब से अपनी श्रद्धा, पूजा और देवार्पण करना। अब तुम अभिन्न हो–धर्म-सूत्र में बद्ध हो।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“पार्थिव लिंग शरीर से जब ज्योति अन्तर्धान हुई, तब देवाधिष्ठान वहाँ कहाँ रहा? देवप्रस्थान तो हो चुका।’’ ‘‘कब?’’ ‘‘आज–अभी।’’ ‘‘तो अब यह लिंग, देवता नहीं?’’ ‘‘नहीं, देवता का पार्थिव शरीर है–जैसे मृत पुरुष का निष्प्राण शरीर रह जाता है।’’ ‘‘देवता कहाँ गए?’’ ‘‘अन्तर्धान हो गए।’’ ‘‘किसलिए?’’ “धर्मद्वेषी शत्रु के विनाश के लिए।’’ ‘‘कहाँ?’’ ‘‘किसी पुण्य शरीर में।’’ ‘‘किस प्रकार?”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“देव-रक्षा भी होनी चाहिए।’’ ‘‘देवता तो नित्य-रक्षित हैं पुत्र।’’ ‘‘फिर भी सुरक्षा के विचार से देवता का स्थानान्तरित होना आवश्यक है।’’ ‘‘सर्वदेशस्थ–सर्वव्यापी देवता का कैसे स्थानान्तर करोगे पुत्र?’’ ‘‘मेरा अभिप्राय ज्योतिर्लिङ्ग से है प्रभु।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“एक महत्त्वपूर्ण बात थी कि ये हिन्दू अपने राजनैतिक जीवन में तो असम्बद्ध थे, किन्तु धार्मिक और सामाजिक जीवन में सम्बद्ध थे।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“केवल नष्ट होने के लिए साहस करना तो आत्मघात कहाता है, और आत्मघात सदैव ही पाप है।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“अब महाराज शुक्ल तीर्थ पधारें।’’ ‘‘वहाँ क्या है?’’ ‘‘देवस्थान हैं, रायस्थली है, सुपर्णा नदी है, वन-विहंगम है, शीतल-मन्द पवन है।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“शुक्ल तीर्थ पधारने के लिए। वहाँ महाराज विराज कर शान्ति से परलोक चिन्तन करें।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“राज-संन्यास महाराज’’ महता ने हँसकर कहा, ‘‘महाराजकुमार योग और भोग दोनों ही का आनन्द-लाभ कर रहे हैं।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“उनकी बड़ी-बड़ी मूँछें, भारी डील, लाल डोरे वाली आँखें, घनश्याम शरीर और घन–गर्जन सा कण्ठस्वर अति भव्य था। उनके”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“राजा कभी मरता ही नहीं है, राजा चिरंजीव है।’’ ‘‘परन्त मैं महाराज चामुण्डराय के सम्बन्ध में”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“राजा वही है जो सबका स्वामी है, जिसे राजत्व का ज्ञान है और मर्यादापालन की शक्ति है। जिसमें वह नहीं है, वह राजा ही नहीं। उसके प्रति विद्रोह का प्रश्न ही नही उठता।’’।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“देव, देवमूर्ति तो पत्थर की होती है। सारी चैतन्य सत्ता तो उसके पुजारी ही में है। पुजारी उसके भोग-ऐश्वर्य का कर्ता-धर्ता है,”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“द्वितीया का क्षीण चन्द्र नूतन वधू की दुर्लभ कान्ति प्रतिभासित कर रहा था।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ
“पदातिकों को कमन्द के द्वारा दुर्ग पर चढ़ाना भी बेकार था।”
आचार्य चतुरसेन [Acharya Chatursen], सोमनाथ

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