कब तक पुकारूं Quotes

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कब तक पुकारूं कब तक पुकारूं by रांगेय राघव
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कब तक पुकारूं Quotes Showing 1-23 of 23
“सफेदी भी करे तो अच्छे मकान पर। क्या टूटे खंडहर का सजाना!” और उसने फिर अपना हाथ मेरे बाजुओं पर रखा और मेरा मांस दबाया।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“सरकार! गरीब आदमी हूं। मुझपर इतनी दया की है, यही बहुत है। भाग ने यह औरत मुझे दे दी थी। इतनी खूबसूरत थी कि इसे तुम जैसों के घर जन्म लेना था, जहां आराम पा सके। भगवान ने सुन ली है। ठिकाना लग ही गया है। मुझे हुक्म दें तो चला जाऊं।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“ओ जोगी! जब भसम रमाई है तो मन लगाके समाध लगा।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“मैं हनुमान जी पर दीपक चढ़ाऊंगा। महादेवजी पर बेलपत्तर चढ़ाऊंगा। पीर के मजार पर दीया चढ़ाऊंगा। ईदगाह की चीटियों को बूरा डालूंगा। तू कहेगी तो पण्डित को सीधा भी दे आऊंगा। भगवान कसम! ठाकुरजी के मन्दिर में जाकर प्रार्थना करूंगा।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“अनिंद्य थी वह बेला। आकाश में मानो सकल वायु मर्मर, वनांत की झूमती मरोर और अंधकार का अतलान्त गहन उच्छ्‌वास सब आज उसी महामोद के अस्पष्ट और छविमय प्रतीक थे, जो प्रतिकण में उच्चरित हो रहे थे। आज स्त्री का रूप अपने वास्तविक सौन्दर्य के कारण विजयी हो गया था; और सुखराम उसे समझ गया था। किन्तु कितना? जैसे समुद्र के किनारे खड़ा हुआ मनुष्य अपने पांवों को भिगो जाने वाली लहरमात्र की तरलता का,”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“मैं सदा से ही उसके रूप को प्यार करता रहा था।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“वह ऐसे हंसती थी जैसे अपनी खूबसूरती की ताकत उसे मालूम है।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“उसने कहा—“वह मेरा पराया है। तू मेरा अपना है। तू न रहेगा तो मैं किसके सहारे जिऊंगी?”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“डरता है कि मैं किसी कंजर से नाता जोड़ लूंगी? यही न? पर नाता जोड़ना और बात है, मन की होके रहना और बात है।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“सौंदर्य प्रत्येक आयु की अपनी एक भिन्‍न सत्ता रखता है।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“प्रेम का अंत संतान में है, न स्त्री में वह अन्त है, न पुरुष में ही। इसी अभिव्यक्ति का नाम मिलन है।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“पूरा चांद निकला हुआ था। झील में उतर आया था बेईमान, चांदी की नाव बनकर, जिस पर किरनों की लड़कियां बैठकर आई थीं। पानी की लहरों पर आकर जैसे नाव डूब गई थी और वे लड़कियां लहरों पर बहने लगी थीं।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“मैं तो धीरे-धीरे जवानी की सड़क को देखने लगा था, क्योंकि बचपन की वह पगडण्डी जाकर उसमें मिल जाती थी।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“यह किशोरावस्था वह अवस्था है जिसमें वह कीट रेशम अपने उदर के भीतर से बुनता है और संसार के लिए उगलता है। यह वह आयु है जिसे मनुष्य की शाश्वत कोमलता, रंगीन और स्वप्‍निल झिलमिल ने आज तक, मनु से लेकर आज तक, अपने काव्य-भवन में प्रवेश करने के पहले, देहलीज़ बनाकर लगा दिया है। सौंदर्य अपनी नई अंगड़ाई लेकर मानो बचपन की नींद को छोड़ना चाहता है। वे अनजान मिठास-भरे दिन, जो बाल्यावस्था में होंठों पर पंखुड़ियों की भांति फिसलते हैं, इस वय पर आकर मानो रसभरी फल की फांकों-सी छाया-माया भरकर नया रूप धारण कर लेते हैं और”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“यह किशोरावस्था वह अवस्था है जिसमें वह कीट रेशम अपने उदर के भीतर से बुनता है और संसार के लिए उगलता है। यह वह आयु है जिसे मनुष्य की शाश्वत कोमलता, रंगीन और स्वप्‍निल झिलमिल ने आज तक, मनु से लेकर आज तक, अपने काव्य-भवन में प्रवेश करने के पहले, देहलीज़ बनाकर लगा दिया है।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“मेरी अंतरात्मा उस भीगे खेत-सी विभोर हो उठी। यह आयु कितनी मादक, कितनी वितृष्ण होती है जब सारी दुनिया इसलिए फैली हुई पड़ी रहती है कि उस पर अपने ही चरणों के वैभव से चलना है।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“पखेरू उड़ाने के लिए लड़के इधर-उधर पुकार रहे”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“बड़ा कुंवर पन्द्रह का, चंदा होगी तेरह या चौदह की। इनके प्रेम का इलाज मेरी राय में फकत दो-दो चांटे थे।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“पानी का एक डोल लेने आई थी।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“रंग भभूका सफेद था।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“—वह ऊंचा घाघरा और फरिया पहने थी। फरिया इस वक्त उसके कंधों के नीचे पड़ी थी।”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“एकमात्र कमरख के फलहीन पेड़ के सामने वह”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru
“फिर कच्चे दगरे की गाय-भैंसों के खुरों से उठी धूल पर आर-पार हो जाने का प्रयत्न कर रही”
रांगेय राघव, Kab Tak Pukaru