Yajnaseni Quotes
Yajnaseni: The Story of Draupadi
by
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Yajnaseni Quotes
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“The meaning of Maya is magic, affection, attachment, deception. That meaning, which results from mixing all of these, is called life. In other words, life is maya”
― Yajnaseni: The Story of Draupadi
― Yajnaseni: The Story of Draupadi
“When a man loses faith in himself he seeks some different path. He cheats himself till his sorrow has passed to be free from torment”
― Yajnaseni: The Story of Draupadi
― Yajnaseni: The Story of Draupadi
“सात दिनों बाद मार्गशिर अमावस्या तिथि है। उसी दिन पुण्यतोया सरस्वती की शुष्क शैया में स्थित पंचह्नद के किनारे ‘कुरुक्षेत्र’ में पांडव-कौरव महासमर आरंभ होगा। कुरुक्षेत्र का अर्थ है कर्मक्षेत्र।”
― Draupadi
― Draupadi
“चन्द्रावली गोपियों में अन्यतम है। कृष्ण की परम प्रेमिका। चन्द्रावली और श्रीराधा में भावगत भेद क्या है ? चन्द्रावली का कृष्ण के प्रति भाव है–‘‘त्वं ममैव’’ यानी तुम मेरे हो। जबकि श्री राधा कहती हैं–‘‘तवैवाहं’’ अर्थात् मैं आपकी हूं। बस इस भेद के कारण श्रीराधाजी चन्द्रावली से श्रेष्ठ हो जाती”
― Draupadi
― Draupadi
“द्रौपदी तुम्हारी है, उसकी देहातीत सत्ता मेरी है। यह संधि हमारे बीच बहुत पहले हो चुकी है।”
― Draupadi
― Draupadi
“अरण्य के इस बंधुर पथ पर दूर जन्मस्थल से निरन्तर चली जा रही है गिरिकन्या तन्द्रावती। वह थकी तो नहीं ! उसका लक्ष्य है सागर ! उधर बहते समय उजाड़ धरती को हरी-भरी करती जा रही। यही है जीवन”
― Draupadi
― Draupadi
“एक और अनुरोध–कर्ण को क्षमा कर देना। उसने तुम्हारे प्रति जो व्यवहार किया, अत्यन्त दुःखद है। संगदोष के कारण उसने ऐसा आचरण किया है। तुम्हारी गहन प्रतिज्ञा ने मेरे हृदय को हिला दिया”
― Draupadi
― Draupadi
“बलिष्ठ लोमश हाथ बढ़ाकर मेरे दीर्घ कुंचित घन केश पकड़ अपनी ओर खींच लिया। लाचार, किसी छिन्नमूल-सी हो रही थी मैं। अरणा भैंसा किसी टूटी लता को घसीटकर ले जाता है, वैसे दुःशासन मुझे सभा भवन तक ले गया।”
― Draupadi
― Draupadi
“एकछत्रवाद की प्रतिष्ठा नहीं वरन् इससे देश में धर्मनिष्ठा, ऐक्य प्रतिष्ठा और सख्य की प्रतिष्ठा होती”
― Draupadi
― Draupadi
“कृष्ण-बलराम की लाड़ली बहन सुभद्रा, मेरे पांव पकड़ दासी बन इंद्रप्रस्थ में सिर छुपाने की अनुमति मांग रही है। उसकी नम्रता, कोमल सहनशीलता के आगे हार माननी पड़ी। ऐसे कोमल पाद कलिका को सौत मानकर द्वेष में जलती”
― Draupadi
― Draupadi
“नारी की प्राणरक्षा से अधिक उसके सम्मान की रक्षा करना वीर पुरुष को अधिक स्पृहणीय है।”
― Draupadi
― Draupadi
“रही मेरी बात। कभी विचार ही न करना। राजपुत्र को बचपन से ही वनवास, विपद, अनाहार, अर्धाहार, दारिद्रय और भाग्य के साथ संग्राम करना होता है।”
― Draupadi
― Draupadi
“अभागी राजकन्याओं को बंधनमुक्त कर उनके माता-पिता को खबर दी। पर जो पिता अपनी कन्या की इस दुरावस्था पर रोते-धोते नहीं थकते, अब उनमें किसी एक ने भी कन्या को वापस लेना स्वीकार नहीं किया। वरन् भेजकर खबर दी–‘‘आत्महत्या ही एकमात्र रास्ता है। नरकासुर के बन्दी गृह में इतने दिन रहने के बाद कोई राजपुत्र तो क्या इतर पुरुष भी उनका पाणिग्रहण नहीं करेगा। वरन् वे फिर पिता के राज्य में जायेंगी तो राज्य का यश क्षय होगा। ऐसे में आत्महत्या के सिवाय कोई चारा नहीं।”
― Draupadi
― Draupadi
“कर्ण ने माया के कुछ निकट आकर कहा– ‘‘राजवधू से क्षमा मांग लेना। जानबूझ कर मैंने उन्हें वेदना नहीं दी। मैं जानता हूं जानबूझ कर सबके सामने यंत्रणा देने का कष्ट कैसा होता है। मेरे स्नेह उपहार ने ही राजवधू को क्षताक्त कर दिया। खैर, मन की ज्वाला से देह की ज्वाला बहुत हल्की होती है, इसी भाव से मुझे क्षमा देंगी”
― Draupadi
― Draupadi
“प्रतिदिन द्रौपदी की सेवा, साहचर्य, सान्निध्य और संसर्ग पांचों भाई चाहेंगे। इसमें अस्वाभाविक भी क्या है ? पर इसी से पांचों की एकता नष्ट हो जायेगी।’’ युधिष्ठिर ने दृढ़ स्वर में कहा–‘‘मेरे भाई मुझे ईश्वर जैसा मानते हैं। अतः हमारे बीच वैसा कोई द्वंद्व उपज नहीं सकता। मेरे आदेश पर भाई राज्य, धन, संपदा सब त्याग कर वनवास जाने में भी कुंठित नहीं होंगे।”
― Draupadi
― Draupadi
“एकाग्र चित्त इसमें खचित केन्द्रस्थल की ओर कुछ क्षण देखने पर मन की अनेक दुविधाओं का समाधान हो जाता है।”
― Draupadi
― Draupadi
“पांडव पांच भाइयों के बीच ऐक्य रखने के लिए मैं बनूंगी सबकी पत्नी ! पृथ्वी पर धर्म-स्थापना करेंगे पांचों पांडव। वे एक न हुए तो पृथ्वी पर धर्म की ही पराजय निश्चित है। अतः मेरी भूमिका स्पष्ट थी।”
― Draupadi
― Draupadi
“मेरे सौंदर्य के प्रति कामातुर, विचार-बुद्धिरहित ये भाई मुझ पर अपना यथेच्छ अधिकार सिद्ध करेंगे और मैं उसे स्वीकार कर लूंगी”
― Draupadi
― Draupadi
“कृष्ण का कभी विश्वास न करना। बहुत मायावी हैं। तुम-से नारी-रत्न को पाकर क्या वे निष्कपट हृदय से ही अर्जुन के हाथ सौंप देंगे ? याद रखना, अर्जुन में कृष्ण की कला है। तुम अर्जुन को प्राप्त कर भी कृष्ण की ही रहीं। तुम पर न्यायतः उन्हीं का अधिकार रहेगा। स्वयंवर का आयोजन देखकर पता नहीं क्यों मेरे मन में संशय हो रहा है ।’’ मैं”
― Draupadi
― Draupadi
“जो वनमाला श्रीकृष्ण के गले में देने के लिए सुबह से गूंथ रही थी, वह अर्जुन के गले में देनी होगी। वह भी कृष्ण की इच्छा पर ! मेरी अपनी कोई इच्छा नहीं ? कोई कामना नहीं ? आकांक्षा नहीं, क्योंकि मैं यज्ञ-होम से जन्मी याज्ञसेनी हूं ! मेरा जन्म, जीवन और मरण किसी और के निर्देश से संचालित है।”
― Draupadi
― Draupadi
“द्रोणान्तक पुत्र पाने के लिए राजा द्रुपद ने कश्यप ॠषि के वंशज उपयाज को संतुष्ट किया। पुत्र-प्राप्ति के लिए उपयाज एवं याज ॠषि से यज्ञ करवाया। यज्ञ की होमाग्नि से तेजोवंत पुत्र मेरे भाई धृष्टद्युम्न और यज्ञवेदी के दो भागों से नील पद्मकांत मणि-सी मैं जन्मी–याज्ञसेनी !”
― Draupadi
― Draupadi
“मैं युवती के रूप में ही पैदा हुई। जनमी नहीं–यज्ञदेवी ही मेरी मां है। याज्ञसेन मेरे पिता हैं। अतः मैं हूं याज्ञसेनी।”
― Draupadi
― Draupadi
“The pages of a book have to be turned, but the leaves of fate turn by themselves”
― Yajnaseni: The Story of Draupadi
― Yajnaseni: The Story of Draupadi
“O Creator Krishna! For the faults in my present birth, let me be born again and again in this land of Bharata.”
― Yajnaseni: The Story of Draupadi
― Yajnaseni: The Story of Draupadi