Divya Quotes

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Divya Divya by Yashpal
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“विशेष श्लाघा पाई।”
यशपाल, Divya
“मन की उग्र इच्छाएँ और व्याकुलताएँ ही मनुष्य के वे संस्कार हैं जो मृत्यु को पीड़ामय बना देते हैं।”
यशपाल, Divya
“कला का भक्त अन्य स्थान से प्रकाश पाकर द्युतिमान होने वाले रत्नों की इच्छा नहीं करता। वह स्वयं आभा उत्पन्न करने वाले रत्नों का आदर करता है।”
यशपाल, Divya
“सरस्वती का उत्तराधिकार गर्भ में नहीं, मुख से होता है।”
यशपाल, Divya
“समाधि और ध्यान का आनन्द केवल अभ्यास से पाया जा सकता है।”
यशपाल, Divya
“सुन्दर पिंजरा था, परन्तु सारिका निष्प्रभ थी।”
यशपाल, Divya
“मैं भिक्षु पृथुसेन, सार्वभौम मैत्री का सुख पाकर, आचार्य के प्रति शत्रुता के भाव से रहित होकर भय और चिन्ता से मुक्त हुआ हूँ।”
यशपाल, Divya
“कर्मकाण्डी और संसारी के लिए सदा ही असन्तोष के अनेक कारण हैं, अनेक चिन्तायें हैं।”
यशपाल, Divya
“पाये बिना किसी वस्तु का त्याग नहीं किया जा सकता। संसार को कोई पा नहीं सकता, इसलिए उसे कोई त्याग भी नहीं सकता। परिग्रह और त्याग दोनों का प्रयोजन संतोष है। जब तक मन में चिन्ता है, संतोष नहीं।”
यशपाल, Divya
“करुणा और मैत्री की भावना से सदा प्रसन्न मुख गम्भीर हो गया। द्वन्द्व से मुक्त उनके मन में घोर द्वन्द्व उत्पन्न हो गया। संघ-स्थविर की आवज्ञा की अवज्ञा कर वे विनय के नियंम का उल्लंघन किस प्रकार करें और वे बोधिसत्व के उपदेश के विरुद्ध आचरण किस प्रकार करें।”
यशपाल, Divya
“विनय का उपदेश है कि जब भिक्षुओं में परस्पर विचार और मत का भेद हो, मार्ग का निर्णय संघसभा करे,”
यशपाल, Divya
“धर्म की रक्षा और संघ के धर्म की रक्षा का महत्व शरणागत को शरण देने में है। इससे संघ का शरीर संकट अनुभव करके भी धर्म की वृद्धि करेगा और शरणागत को त्याग कर संघ को शरीर-रक्षा के मोह से धर्म की हानि होगी।”
यशपाल, Divya
“बोधिसत्व ने शरणागत, अकिंचन पक्षी की रक्षा के लिये अपने शरीर का मांरु अर्पण किया था।”
यशपाल, Divya
“जैसे जल का विशेष उपयोग तृषा अनुभव होने पर होता है, उसी प्रकार धर्मपालन भी संकट के समय ही महत्व रखता है।”
यशपाल, Divya
“धर्म की रक्षा के लिये शरणागत को शरण देना आवश्यक”
यशपाल, Divya
“धर्म पर संकट नहीं आता। केवल धर्म के प्रति विश्वास प्रकट करने वाले जन भयभीत होकर संकट अनुभव करते हैं। धर्म कभी अधिक मनुष्यों के हृदय और विश्वास में स्थान पाता है और कभी कम मनुष्यों के।”
यशपाल, Divya
“निर्भय वही है जो भय के कारणों से मुक्त है। तुम्हारी शक्ति से यदि दूसरा भयभीत है तो उसका भयभीत रहना तुम्हारे भय का गुप्त बीज है। अनुकूल भूमि और ॠतु पाने से भय का यह बीज किसी भी समय अंकुरित हो सकता है।”
यशपाल, Divya
“जो तुमसे भय करता है उससे तुम भी भय करते हो।”
यशपाल, Divya
“विजय शत्रु का शरीर वश करने में नहीं, उसके मन की भावना को वश करने में है। जैसे तथागत ने देवदत्त के मन को, धर्मघोष ने सम्राट अशोक के मन को और अर्हत नागसेन ने सम्राट मिलिन्द के मन को विजय किया था।”
यशपाल, Divya
“मूल्यवान, कापिशायिनी, कांधारी, मागधी, द्राक्षी आदि सुराएँ”
यशपाल, Divya
“कला की उस पीठ में पर्व और तिथि के उपलक्ष्य में होने वाला कला का अनुष्ठान केवल रीति की रक्षा मात्र रह गया था; प्राण और उत्साह का उसमें अभाव था।”
यशपाल, Divya
“कला व्यवस्थित चित्त की वस्तु है”
यशपाल, Divya
“आसक्ति और साधना का संयोग असम्भव है।”
यशपाल, Divya
“जो साधना के लिये अपनी प्रवृत्तियों का दमन नहीं कर सकता, वह पूर्णता नहीं पा सकता।”
यशपाल, Divya
“जागती हुई चींटी की शक्ति सोते हुए हाथी से अधिक होती है!”
यशपाल, Divya
“ख्याति जनश्रुति की लहरों पर दूर देशों की ओर फैलने लगी।”
यशपाल, Divya
“जीवन का कोई अनुभव स्थायी और चिरंतन नहीं। जीवन की स्थिति समय में हैं और समय प्रवहमान है। प्रवाह में साधु-असाधु, प्रिय-अप्रिय सभी कुछ आता है। प्रवाह का यह क्रम ही सृष्टि और प्रकृति की नित्यता है। जीवन के प्रवाह में एक समय असाधु, अप्रिय अनुभव आया इसलिए उस प्रवाह से विरक्त होकर जीवन की तृषा को तृप्त न करना केवल हठ है।”
यशपाल, Divya
“निरन्तर प्रयत्न ही जीवन का लक्षण है। जीवन के एक प्रयत्न या एक अंश की विफलता सपूर्ण जीवन की विफलता नहीं”
यशपाल, Divya
“नारी सृष्टि का साधन है। सृष्टि की आदि शक्ति का क्षेत्र वह समाज और कुल का केन्द्र है।”
यशपाल, Divya
“जब तक जीवन है उसमें परिवर्तन और प्रयत्न के लिए अवसर और सम्भावना है।”
यशपाल, Divya

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