Chintamani Quotes

Rate this book
Clear rating
Chintamani Chintamani by Ramchandra Shukla
28 ratings, 4.07 average rating, 1 review
Chintamani Quotes Showing 1-30 of 291
“सच्चा कवि वही है जिसे लोक-हृदय के पहचान हो,”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“अन्त:करण सदा अभावमय रहता है। उसके लिए जो है वह भी नहीं है।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“श्रद्धा सामर्थ्य के प्रति होती है और दया असामर्थ्य के प्रति।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“वे (शुक्ल जी) इतने गम्भीर और कठोर थे कि उनके वक्तव्यों की सरसता उनकी बुद्धि की आँच से सूख जाती थी।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“आचार्य शुक्ल को टाल्सटॉय और गांधी का अन्याय के निष्क्रिय प्रतिरोध का सिद्धान्त एक क्षण के लिए भी मान्य नहीं था।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“और हिंसा को कहाँ रखते हैं गुरुजी?’ शुक्ल जी बोले-‘भीष्म भगवान् नहीं हुए। लोकव्यापी, अत्याचार के विरुद्ध शस्त्र उठाने वाले राम, कृष्ण ही भगवान् कहलाये, भगवान के नाम पर चलने वाले धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहिए।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“आजाद ने कहा-‘पण्डित जी, अब तो हम फाँसी के तख्ते पर भारत माँ को ढूँढ़ते हैं।’ शुक्ल जी ने उत्तर दिया-‘बेटे, भारत माँ को खेतों में ढूँढ़ो। विश्व आन्दोलन के मेल में हमारा स्वाधीनता आन्दोलन होना चाहिए। किसानों का संगठन किये बिना आन्दोलन सफल नहीं होगा।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“अनुभूति के द्वन्द्व ही से प्राणी के जीवन का आरम्भ होता है।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“दु:खमय संसार में सुख की इच्छा और प्रयत्न प्राणियों का लक्षण है।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“सुख और दु:ख दो पक्ष होंगे ही। इनमें से कोई पक्ष स्थिर नहीं रह सकता। संसार और स्थिरता?”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“जीवन का भोग-पक्ष–यौवन-मद, विलास की प्रभूत सामग्री कला-सौन्दर्य की जगमगाहट, राग-रंग और आमोद-प्रमोद की चहल-पहल–और दूसरी ओर अवसाद, नैराश्य, कष्ट, वेदना”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“जीवन का नित्य स्वरूप दिखाने वाला दर्पण मनुष्य के पीछे रहता है; आगे तो बराबर खिसकता हुआ दुर्भेद्य परदा रहता है।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“हृदय के लिए अतीत एक मुक्ति-लोक है”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“मित्रों की मण्डली जमती थी, रमणियों का हास-विलास होता था, बालकों का का क्रीड़ा-रव सुनायी पड़ता था”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“-बड़े तोरणों से युक्त उन्नत प्रासादों की, उत्तरीय और उष्णीषधारी नागरिकों की, अलक्तरंजित चरणों में पड़े हुए नूपुरों की झंकार की, कटि के नीचे लटकती हुई कांची के लड़ियों की, धूप-वासित केश-कलाप और पत्रभंग मंडित गंडस्थल की भावना उसके मन में चित्र-सी”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“पुरानी दिल्ली, कन्नौज, थानेसर, चित्तौड़, उज्जयिनी, विदिशा इत्यादि के खंडहरों”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“जो उस व्यक्ति या वस्तु को हमारी अन्तस्सत्ता में सम्मिलित कर दे। वह शक्ति है–राग या प्रेम।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“शोक’ अपनी निज की इष्ट-हानि पर होता है और ‘करुणा’ दूसरों की दुर्गति या पीड़ा पर”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“इष्ट-हानि या अनिष्ट-प्राप्ति से जो ‘शोक’ नामक वास्तविक दु:ख होता”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“हृदय की मुक्त दशा में होने के कारण वह दु:ख़ भी रसात्मक होता है।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“हृदय का व्यक्तिबद्ध दशा से मुक्त और हल्का होकर”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“हास’ में भी यही बात होती है कि जहाँ उसका पात्र सामने आया कि मनुष्य अपना सारा दु:ख-सु:ख भूल एक विलक्षण आह्लाद का अनुभव करता है,”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“चंचल भ्रूविलास”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“काव्य शब्द-व्यापार है। वह शब्द-संकेतों के द्वारा ही अन्तस् में वस्तुओं और व्यापारों का मूर्ति-विधान करने का प्रयत्न करता है।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“प्रत्यक्ष रूपों की मार्मिक अनुभूति जिनमें जितनी ही अधिक होती है, वे उतने ही रसानुभूति के उपयुक्त होते हैं।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“संसार-सागर की रूप-तरंगों से ही मनुष्य की कल्पना का निर्माण”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“काव्य का काम है कल्पना में ‘बिम्ब’ (Images) या मूर्त भावना उपस्थित करना;”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“काव्य का विषय सदा ‘विशेष’ होता है,”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1
“लोक-हृदय में हृदय के लीन होने की दशा का नाम रस-दशा है।”
Ramchandra Shukla, Chintamani : Vol. 1

« previous 1 3 4 5 6 7 8 9 10