Chintamani Quotes
Chintamani
by
Ramchandra Shukla28 ratings, 4.07 average rating, 1 review
Chintamani Quotes
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“सच्चा कवि वही है जिसे लोक-हृदय के पहचान हो,”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“अन्त:करण सदा अभावमय रहता है। उसके लिए जो है वह भी नहीं है।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“श्रद्धा सामर्थ्य के प्रति होती है और दया असामर्थ्य के प्रति।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“वे (शुक्ल जी) इतने गम्भीर और कठोर थे कि उनके वक्तव्यों की सरसता उनकी बुद्धि की आँच से सूख जाती थी।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“आचार्य शुक्ल को टाल्सटॉय और गांधी का अन्याय के निष्क्रिय प्रतिरोध का सिद्धान्त एक क्षण के लिए भी मान्य नहीं था।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“और हिंसा को कहाँ रखते हैं गुरुजी?’ शुक्ल जी बोले-‘भीष्म भगवान् नहीं हुए। लोकव्यापी, अत्याचार के विरुद्ध शस्त्र उठाने वाले राम, कृष्ण ही भगवान् कहलाये, भगवान के नाम पर चलने वाले धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहिए।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“आजाद ने कहा-‘पण्डित जी, अब तो हम फाँसी के तख्ते पर भारत माँ को ढूँढ़ते हैं।’ शुक्ल जी ने उत्तर दिया-‘बेटे, भारत माँ को खेतों में ढूँढ़ो। विश्व आन्दोलन के मेल में हमारा स्वाधीनता आन्दोलन होना चाहिए। किसानों का संगठन किये बिना आन्दोलन सफल नहीं होगा।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“अनुभूति के द्वन्द्व ही से प्राणी के जीवन का आरम्भ होता है।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“दु:खमय संसार में सुख की इच्छा और प्रयत्न प्राणियों का लक्षण है।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“सुख और दु:ख दो पक्ष होंगे ही। इनमें से कोई पक्ष स्थिर नहीं रह सकता। संसार और स्थिरता?”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“जीवन का भोग-पक्ष–यौवन-मद, विलास की प्रभूत सामग्री कला-सौन्दर्य की जगमगाहट, राग-रंग और आमोद-प्रमोद की चहल-पहल–और दूसरी ओर अवसाद, नैराश्य, कष्ट, वेदना”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“जीवन का नित्य स्वरूप दिखाने वाला दर्पण मनुष्य के पीछे रहता है; आगे तो बराबर खिसकता हुआ दुर्भेद्य परदा रहता है।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“हृदय के लिए अतीत एक मुक्ति-लोक है”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“मित्रों की मण्डली जमती थी, रमणियों का हास-विलास होता था, बालकों का का क्रीड़ा-रव सुनायी पड़ता था”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“-बड़े तोरणों से युक्त उन्नत प्रासादों की, उत्तरीय और उष्णीषधारी नागरिकों की, अलक्तरंजित चरणों में पड़े हुए नूपुरों की झंकार की, कटि के नीचे लटकती हुई कांची के लड़ियों की, धूप-वासित केश-कलाप और पत्रभंग मंडित गंडस्थल की भावना उसके मन में चित्र-सी”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“पुरानी दिल्ली, कन्नौज, थानेसर, चित्तौड़, उज्जयिनी, विदिशा इत्यादि के खंडहरों”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“जो उस व्यक्ति या वस्तु को हमारी अन्तस्सत्ता में सम्मिलित कर दे। वह शक्ति है–राग या प्रेम।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“शोक’ अपनी निज की इष्ट-हानि पर होता है और ‘करुणा’ दूसरों की दुर्गति या पीड़ा पर”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“इष्ट-हानि या अनिष्ट-प्राप्ति से जो ‘शोक’ नामक वास्तविक दु:ख होता”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“हृदय की मुक्त दशा में होने के कारण वह दु:ख़ भी रसात्मक होता है।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“हृदय का व्यक्तिबद्ध दशा से मुक्त और हल्का होकर”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“हास’ में भी यही बात होती है कि जहाँ उसका पात्र सामने आया कि मनुष्य अपना सारा दु:ख-सु:ख भूल एक विलक्षण आह्लाद का अनुभव करता है,”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“चंचल भ्रूविलास”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“काव्य शब्द-व्यापार है। वह शब्द-संकेतों के द्वारा ही अन्तस् में वस्तुओं और व्यापारों का मूर्ति-विधान करने का प्रयत्न करता है।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“प्रत्यक्ष रूपों की मार्मिक अनुभूति जिनमें जितनी ही अधिक होती है, वे उतने ही रसानुभूति के उपयुक्त होते हैं।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“संसार-सागर की रूप-तरंगों से ही मनुष्य की कल्पना का निर्माण”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“काव्य का काम है कल्पना में ‘बिम्ब’ (Images) या मूर्त भावना उपस्थित करना;”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“काव्य का विषय सदा ‘विशेष’ होता है,”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
“लोक-हृदय में हृदय के लीन होने की दशा का नाम रस-दशा है।”
― Chintamani : Vol. 1
― Chintamani : Vol. 1
