Mansarovar - Part 3 Quotes

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Mansarovar - Part 3 (Hindi) Mansarovar - Part 3 by Munshi Premchand
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Mansarovar - Part 3 Quotes Showing 1-30 of 36
“करें क्या? यों उन्होने फलदान तो रख लिया है पर मुझसे कह दिया है कि लड़का स्वभाव का”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“जब किसी कौम की औरतों में गैरत नहीं रहती तो वह कौम मुरदा हो जाती है।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“वीर माता, तुम्हें धन्य है! ऐसी ही माता से देश का मुख उज्ज्वल होता है, जो देश-हित के सामने मातृ-स्नेह की धूल-बराबर परवाह नहीं करती! उनके पुत्र देश के लिए होते हैं, देश पुत्र के लिए नहीं होता। ***”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“प्राण का भय न था, सम्पत्ति का भय न था, भय था मर्यादा का। विजेता गर्व से मतवाले होकर यूनानी ललनाओं को घूरेंगे, उनके कोमल अंगों को स्पर्श करेंगे,उनको कैद कर ले जायेंगे। उस विपत्ति की कल्पना ही से इन लोगों के रोयें खड़े हो जाते थे।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“तुमसे सच कहता हूं, बिरादरी के अन्याय से कलेजा छलनी हो गया है। पत्नी—बिरादरी को बुरा मत कहो। बिरादरी का डर न हो तो आदमी न जाने क्या-क्या उत्पात करे। बिरादरी को बुरा न कहो।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“पत्नी से अधिक पुरुष के चरित्र का ज्ञान और किसी को नहीं होता।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“चोर को अदालत में बेंत खाने से उतनी लज्जा नहीं आती, जितनी किसी हाकिम को अपनी रिश्वत का परदा खुलने से आती है। वह जहर खा कर मर जायगा; पर संसार के सामने अपना परदा न खोलेगा। अपना सर्वनाश देख सकता है; पर यह अपमान नहीं सह सकता,”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“हिंदू होने के कारण संस्कारों की शंका कुछ-कुछ बनी हुई है। ब्रह्महत्या का कलंक सिर पर लेते हुए आत्मा कांपती है। बस इतनी बात है।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“मै कलामेपाक की कसम खाकर कहता हूं कि तुममें से किसी को कटार पर हाथ रखते देखकर मुझे बेहद खुशी होती, मै उन नाजुक हाथों के सामने गरदन झुका देता! पर अफसोस है कि आज तैमूरी खानदान की एक बेटी भी यहां ऐसी नहीं निकली जो अपनी हुरमत बिगाड़ने पर हाथ उठाती। अब यह सल्लतनत जिंदा नहीं रह सकती। इसकी हसती के दिन गिने हुए हैं। इसका निशान बहुत जल्द दुनिया से मिट जाएगा।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“सहसा नादिरशाह कठोर शब्दों में बोला-ऐ खुदा की बंदियो,मैने तुम्हारा इम्तहान लेने के लिए बुलाया था और अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि तुम्हारी निसबत मेरा जो गुमान था, वह हर्फ-ब-हर्फ सच निकला। जब किसी कौम की औरतों में गैरत नहीं रहती तो वह कौम मुरदा हो जाती है।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“सुख-भोग की लालसा आत्म-सम्मान का सर्वन्नाश कर देती है।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“माता का हृदय दया का आगार है। उसे जलाओ तो उसमें दया की ही सुगंध निकलती है, पीसो तो दया का ही रस निकलता है। वह देवी है। विपत्ति की क्रूर लीलाएं भी उस स्वच्छ निर्मल स्रोत को मलिन नहीं कर सकतीं।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“वासुदेव की उम्र पांच साल से अधिक न थी। अबकी उसका ब्याह होने वाला था। बातचीत हो चुकी थी। बोला— तब तो दूसरे के घर न जायगी न? मा — नही, जब तेरे साथ ब्याह हो जायगी तो क्यों जायगी? वासुदेव-- तब मैं करूंगा मां— अच्छा, उससे पूछ, तुझसे ब्याह करेगी। वासुदेव अनूप की गोद में जा बैठा और शरमाता हुआ बोला—हमसे ब्याह करोगी? यह कह कर वह हंसने लगा; लेकिन अनूप की आंखें डबडबा गयीं, वासुदेव को छाती से लगाते हुए बोली ---अम्मा, दिल से कहती हो? सास—भगवान् जानते है ! अनूपा—आज यह मेरे हो गये? सास — हां सारा गांव देख रहा है । अनूपा — तो भैया से कहला भैजो,घर जायें,मैं उनके साथ न जाऊंगी।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“अनूपा—मैं सगाई न करूंगी। सास—कैसी बात करती है बेटी?सारी तैयारी हो गयी। लोग सुनेंगे तो क्या कहेगें? अनूपा—जो चाहे कहें, जिनके नाम पर १४ वर्ष बैठी रही उसी के नाम पर अब भी बैठी रहूंगी। मैंने समझा था मरद के बिना औरत से रहा न जाता होगा। मेरी तो भगवान ने इज्जत आबरू निबाह दी। जब नयी उम के दिन कट गये तो अब कौन चिन्ता है ! वासुदेव की सगाई कोई लडकी खोजकर कर दो। जैसे अब तक उसे पाला,उसी तरह अब उसके बाल-बच्चों को पालूंगी।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“जिस ह्रदय मे सेवा को स्रोत बह रहा हो—स्वाधीन सेवा का—उसमें वासनाओं के लिए कहां स्थान ? वासना का वार निर्मम, आशाहीन,आधारहीन प्राणियों पर ही होता है चोर की अंधेरे में ही चलती है, उजाले में नही।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“अपने लिए जीना या तो महात्माओं को आता है या लम्पटों ही को”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“धनहीन प्राणी को जब कष्ट-निवारण का कोई उपाय नहीं रह जाता तो वह लज्जा को त्याग देता है।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“क्या अपने घर मे रहकर माया-मोह से मुक्त नहीं हो सकती हो? माया-मोह का स्थान मन है, घर नहीं।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“परशुराम— वासुदेव मेरा पुत्र है। मर्यादा—उसे एक बार प्यार कर लेने दोगे? परशुराम—अपनी इच्छा से नहीं,तुम्हारी इच्छा हो तो दूर से देख सकती हो। मर्यादा—तो जाने दो, न देखूंगी। समझ लूंगी कि विधवा हूं और बांझ भी। चलो मन, अब इस घर में तुम्हारा निबाह नहीं है। चलो जहां भाग्य ले जाय।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“जहां भावों का संबंध है,वहां तर्क और न्याय से काम नहीं चलता।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“मैं यह पंक्तियां न लिखतीं, लेकिन इस विचार से लिख रही हूं कि मेरी आत्म-कथा पढ़कर लोगों की आंखे खुलें; मैं फिर कहती हूं कि अब भी अपनी बालिकाओ के लिए मत देखों धन, मत देखों जायदाद, मत देखों कुलीनता,केवल वर देखों। अगर उसके लिए जोड़ा का वर नहीं पा सकते तो लड़की को क्वारी रख छोड़ो, जहर दे कर मार डालो, गला घोंट डालो, पर किसी बूढ़े खूसट से मत ब्याहो। स्त्री सब-कुछ सह सकती है। दारुण से दारुण दु:ख, बड़े से बड़ा संकट, अगर नहीं सह सकती तो अपने यौवन-काल की उंमगो का कुचला जाना।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“उसके जवाब में मालिन्य या कटुता का लेश भी न होता था। उसका एक-एक शब्द सरल,स्वच्छ ,चित्त को प्रसन्न करने वाले भावों में डूबा होता था।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“महंत-आप नास्तिक हों, पर आप कितने ही नास्तिकों को आस्तिक बना देती हैं। मिस्टर जौहरी—आपने लाख की बात की कहीं मंहत जी! मिसेज भरुचा—क्यों महंत जी, आपको मिस जोशी ही न आस्तिक बनाया है क्या?”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“हम सब मिट्टी के पुतले हैं,कोई निर्दोर्ष नहीं। मनुष्य बिगड़ता है तो परिस्थितियों से, या पूर्व संस्कारों से । परिस्थितियों का त्याग करने से ही बच सकता है, संस्कारों से गिरने वाले मनुष्य का मार्ग इससे कहीं कठिन है। आपकी आत्मा सुन्दर और पवित्र है,केवल परिस्थितियों ने उसे कुहरे की भांति ढंक लिया है। अब विवेक का सूर्य उदय हो गया है, ईश्वर ने चाहातो कुहरा भी फट जाएगा। लेकिन सबसे पहले उन परिस्थितियों का त्याग करने को तैयार हो जाइए। मिस जोशी—यही आपको करना होगा।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“मैं जिस संसार में हूँ, उसकी जलवायु ही दूषित है। वहां सभी मुझे कीचड़ में लतपत देखना चाहते है।, मेरे विलासासक्त रहने में ही उनका स्वार्थ है। आप वह पहले आदमी हैं जिसने मुझ पर विश्वास किया है, जिसने मुझसे निष्कपट व्यवहार किया है। ईश्वर के लिए अब मुझे भूल न जाइयेगा। आपटे ने मिस जोशी की ओर वेदना पूर्ण दृष्टि से देखकर कहा—अगर मैं आपकी कुछ सेवा कर सकूँ तो यह मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“आपटे—तो शौक से लीजिए। मैं बतला चुका हूं कि मैंने चोरी के अपराध में कैद की सजा पायी थी। नासिक के जेल में रखा गया था। मेरा शरीर दुर्बल था, जेल की कड़ी मेहनत न हो सकती थी और अधिकारी लोग मुझे कामचोर समझ कर बेंतो से मारते थे। आखिर एक दिन मैं रात को जेल से भाग खड़ा हुआ। मिस जोशी—आप तो छिपे रुस्तम निकले! आपटे — ऐसा भागा कि किसी को खबर न हुई। आज तक मेरे नाम वारंट जारी है और ५०० रु.का इनाम भी है। मिस जोशी—तब तो मैं आपको जरुर पकड़ा दूंगी। आपटे—तो फिर मैं आपको अपना असल नाम भी बता देता हूं। मेरा नाम दामोदर मोदी है। यह नाम तो पुलिस से बचने के लिए रख छोड़ा है।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“मिस जोशी—तब तो मैं आपको जरुर पकड़ा दूंगी। आपटे—तो फिर मैं आपको अपना असल नाम भी बता देता हूं। मेरा नाम दामोदर मोदी है। यह नाम तो पुलिस से बचने के लिए रख छोड़ा है।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“बाहरी प्रमाणों से आप किसी के अंतस्तल की बात नहीं जान सकते । आपटे-जिसका भीतर-बाहर एक न हो, उसे देख कर भ्रम में पड़ जाना स्वाभाविक है।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“अनुमान तो बाहरी प्रमाणों से ही किया जाता है।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3
“मुझ पर क्या-क्या आक्षेप किए थे? मैं आपसे जोर देकर कहती हूं किवे आक्षेप करके आपने मुझपर घोर अत्याचार किया है। आप जैसे सहृदय, शीलवान, विद्‌वान आदमी से मुझे ऐसी आशा न थी। मैं अबला हूं, मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है? क्या आपको उचित था कि एक अबला पर मिथ्यारोपण करें? अगर मैं पुरुष होती तो आपसे ड्‌यूल खेलने काक आग्रह करती । अबला हूं, इसलिए आपकी सज्जनता को स्पर्श करना ही मेरे हाथ में है। आपने मुझ पर जो लांछन लगाये हैं, वे सर्वथा निर्मूल हैं।”
Munshi Premchand, Mansarovar - Part 3

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