तरकश /ترکش / Tarkash Quotes

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तरकश /ترکش / Tarkash तरकश /ترکش / Tarkash by Javed Akhtar
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तरकश /ترکش / Tarkash Quotes Showing 1-15 of 15
“सब का ख़ुशी से फ़ासला एक क़दम है हर घर में बस एक ही कमरा कम है”
Javed Akhtar, Tarkash
“दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं ज़ख़्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते हैं र”
Javed Akhtar, Tarkash
“अपनी वजहे-बरबादी सुनिये तो मज़े की है ज़िंदगी से यूँ खेले जैसे दूसरे की है”
Javed Akhtar, Tarkash
“ऊँची इमारतों से मकां मेरा घिर गया कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए”
Javed Akhtar, Tarkash
“आज इतने बरसों बाद जब अपनी ज़िंदगी को देखता हूँ तो लग़ता है कि पहाड़ों से झरने की तरह उतरती, चटानों से टकराती, पत्थरों में अपना रास्ता ढूँढती, उमड़ती, बलखाती, अनगिनत भँवर बनाती, तेज़ चलती और अपने ही किनारों को काटती हुई ये नदी अब मैदानों में आकर शांत और गहरी हो गई”
Javed Akhtar, Tarkash
“न जलने पाते थे जिसके चूल्हे भी हर सवेरे सुना है कल रात से वो बस्ती भी जल रही है मैं”
Javed Akhtar, Tarkash
“हमको उठना तो मुँह अँधेरे था लेकिन इक ख़्वाब हमको घेरे था”
Javed Akhtar, Tarkash
“सब हवाएँ ले गया मेरे समंदर की कोई और मुझको एक कश्ती बादबानी1 दे गया”
Javed Akhtar, Tarkash
“ऊँची इमारतों से मकाँ मेरा घिर गया कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए”
Javed Akhtar, Tarkash
“एक ये घर जिस घर में मेरा साज़ो-सामां रहता है एक वो घर जिसमें मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं।”
Javed Akhtar, Tarkash
“आज इतने बरसों बाद जब अपनी ज़िंदगी को देखता हूँ तो लग़ता है कि पहाड़ों से झरने की तरह उतरती, चटानों से टकराती, पत्थरों में अपना रास्ता ढूँढती, उमड़ती, बलखाती, अनगिनत भँवर बनाती, तेज़ चलती और अपने ही किनारों को काटती हुई ये नदी अब मैदानों में आकर शांत और गहरी हो गई है।”
Javed Akhtar, Tarkash
“मैं अकसर सोचता हूँ कि मुझमें कौन से लाल टँके हैं औऱ जगदीश में ऐसी क्या ख़राबी थी। ये भी तो हो सकता था कि तीन दिन बाद जगदीश के किसी दोस्त ने उसे बांदरा बुला लिया होता और मैं पीछे उन गुफाओं में रह जाता। कभी-कभी सब इत्तिफ़ाक़ लगता है। हम लोग किस बात पर घमंड करते हैं)।”
Javed Akhtar, Tarkash
“जब हम दोनों अलग हो रहे थे तो मैंने उसका कड़ा उससे लेकर पहन लिया था और वह आज तक मेरे हाथ में है और जब भी उसके बारे में सोचता हूँ ऐसा लगता है कि वो मेरे सामने है और कह रहा है— बहुत नाकामियों पर आप अपनी नाज़ करते हैं अभी देखी कहाँ हैं, आपने नाकामियाँ मेरी”
Javed Akhtar, Tarkash
“इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं होठों पे लतीफ़े हैं आवाज़ में छाले हैं”
Javed Akhtar, Tarkash
“आओ अब हम इसके भी टुकड़े कर लें ढाका, रावलपिंडी और दिल्ली का चाँद”
Javed Akhtar, Tarkash