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Kamlesh D. Patel
“एक गुरु के अन्दर कभी यह विचार नहीं आता कि वह गुरु है। अगर उसके हृदय में यह भावना एक बार भी प्रवेश कर गयी तो मेरे विचार से वह इस कार्य के लिए उसी क्षण अयोग्य हो जाता है। वास्तव में एक गुरु को स्वयं को नौकर से भी कम समझना चाहिए। लेकिन इसकी बजाय हमें अक्सर कई सारे स्वयम्भू गुरु देखने को मिल जाते हैं। आपको पता है, मैंने कभी चारी जी को स्वयं को बाबूजी के शिष्य के अलावा और कुछ कहते नहीं सुना। और बाबूजी... वे तो इतने विनम्र थे कि “मैं” शब्द से वह भ्रमित हो जाते थे।”
Kamlesh D. Patel, The Heartfulness Way (Hindi)

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