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“वह अपने ही भीतर किसी बात पर विचार कर रहे हैं। मुझे पहले इस बात पर संदेह होता है कि उन्होंने मेरी बात सुनी भी या नहीं, परंतु वहाँ मैं उनके मौन को तोड़ने का बिलकुल इच्छुक नहीं हूँ। मेरे तार्किक मस्तिष्क से कहीं बड़ी एक शक्ति है, जो धीरे-धीरे मुझ पर हावी हो रही है। इस अदृश्य शक्ति से मुझे यह बोध हो रहा है कि मेरे विचार, मेरे प्रश्नोत्तर किसी अनंत खेल का हिस्सा हैं। विचारों के उस खेल की कोई सीमा नहीं है। मेरे अपने भीतर अनिश्चितता का एक कुआँ है और मुझे उसी से सत्य का जल प्राप्त होगा। शायद यही अच्छा होगा कि मैं प्रश्न करना बंद कर दूँ और अपने आध्यात्मिक स्वभाव की अनंत संभावनाओं को समझने का प्रयत्न करूँ। मैं शांत रहकर प्रतीक्षा करना बेहतर समझता हूँ।”
― Gupt Bharat ki Khoj
― Gupt Bharat ki Khoj
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