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कृष्णा सोबती
“जिंदगी में कुछ नोना–नमकीन और कुछ मिश्री–मीठा । इतना ही । पछतावा कैसा ! सबकी जन्मपत्री चितकबरी ही हुआ करती है । हर्ष–शोक, लाभ–हानि, ऊँच–नीच–सब बारी–बारी अपनी झलक दिखाते हैं । ऐसा किसी के हाथ में नहीं कि फुलझड़ियाँ ही छूटती रहें । सब गर्म–सर्द समय में घुल–मिल जाते हैं । इसकी नाकाबंदी ऊपरवाले के सिवाय कोई दूसरा नहीं कर सकता । पर एक बात समझने की है । जो पोत बनाएँगे, वही सागर में उतरेंगे । श्रम करेंगे तो फल पाएँगे । यही उत्स है । जीनेवालों की प्राप्ति ।”
कृष्णा सोबती [Krishna Sobti], ऐ लड़की

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