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“वाल्मीकि के बाद की रामकथाओं में संभवत: सर्वाधिक प्राचीन और प्रसिद्ध भी, महर्षि कंबन की तमिल रामकथा है। रामकथा में परिष्कार का प्रयास भी यहीं से आरंभ हो गया। कंबन ने अपनी कथा में कई परिवर्तन किये किन्तु मेरी समझ में उनमें सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन रावण के चरित्र में है। कंबन का रावण अत्यंत उदात्त चरित्र है। उसकी प्रजा उससे प्यार करती है। कंबन से तुलसी तक आते-आते रावण विद्वान तो रह गया किन्तु उसके व्यक्तित्व के उदात्त गुणों का ह्रास होता चला गया। तुलसी के राम वाल्मीकि के राम की तरह मानव नहीं रहे, वे विराट् ब्रह्म का अवतार हो गये। वे मात्र कथा के नायक नहीं तुलसी के आराध्य भी हैं। स्वाभाविक है कि आराध्य के चरित्र का चित्रण भक्त भक्तिभाव से ही करेगा। ऐसे में नायक के चरित्र को उठाने के लिये खलनायक के चरित्र को गिराना अपरिहार्य हो जाता है। वही हुआ भी। तुलसी के राम मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में स्थापित हुए। इस्लाम के वर्चस्व से आक्रांत हिन्दुत्व ने तुलसी के राम में अपना उद्धारक खोजने का प्रयास किया और मर्यादा पुरुषोत्तम राम भारत के जन-जन के आराध्य बन गये।”

Sulabh Agnihotri, Poorv Pithika (Ram-Ravan Katha Book 1)
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Poorv Pithika (Ram-Ravan Katha Book 1) (Hindi Edition) Poorv Pithika (Ram-Ravan Katha Book 1) by Sulabh Agnihotri
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