“मिसाल के तौर पर, यदि आप उपचार चाहते हैं, तो शांत हो जाएँ, तनावरहित हो जाएँ, आराम से साँस लें, अपने ध्यान को गतिहीन कर लें, अपने अवचेतन मन में उपचार की शक्ति के बारे में सोचें और दृढ़तापूर्वक कहें कि आपके शरीर के अंग का इसी समय उपचार हो रहा है। ऐसा करते वक़्त आपके हृदय में कोई द्वेष या कटुता नहीं रहनी चाहिए; आपको हर एक को क्षमा कर देना चाहिए। आप इस उपचार प्रक्रिया को दिन में तीन-चार बार दोहरा सकते हैं। याद रखें, आपके अवचेतन मन ने शरीर को बनाया था, इसलिए यह उसका उपचार भी कर सकता है। होता यह है कि लोग अपने शरीर के किसी अंग या हिस्से का उपचार दृढ़ कथनों से करते हैं, लेकिन फिर मिनट बाद कहते हैं, ‘‘ओह, मेरी हालत तो 10-15 ज़्यादा ख़राब होती जा रही है; मैं कभी ठीक नहीं हो पाऊँगा। मैं लाइलाज हूँ ।’’ यह मानसिक नज़रिया या नकारात्मक कथन पिछले, सकारात्मक दृढ़ कथन को ख़ारिज कर देते हैं।”
―
MANN KE CHAMATKAR
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