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सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

“पाण्डवों की सेना को छत्र भंग और अर्जुन को युद्ध से परांगमुख देखकर श्रीकृष्ण से न रहा गया। उन्होंने घोड़ों की जोत छोड़ दी। और रथ से उतरकर एक पहिया उठा लिया और भीष्म को मारने के लिए बढ़ गये। क्रोध से आँखें लाल हो रही थीं, मुख से संहार की अखण्ड ज्योति निकल रही थी। योगेश्वर भगवान वासुदेव के क्रोधकम्पित पदक्षेपों से पृथ्वी काँप उठी। कौरवों की सेना में खलबली मच गयी। सब त्रस्त भाव से वह कराल मूर्ति निरीक्षण करने लगे। भीष्म की ओर उन्हें बढ़ते देखकर सब लोगों के मुख से एकाएक यही निकला कि भीष्म हत हो गये—अब किसी तरह भी नहीं बच सकते। वासुदेव को युद्ध के लिए आये हुए देखकर महावीर भीष्म भक्ति से विह्वल हो गये। आँखों से आनन्द की धारा झरने लगी। हाथ जोड़कर कहने लगे, “आओ प्रभु, मेरा संहार करो। मुझे आज तुमने प्रभूत सम्मान का अधिकारी कर दिया है। मुझ पर प्रहार करो। मैं तुम्हारा दास प्रस्तुत हूँ।” श्रीकृष्ण के पीछे अर्जुन भी आ रहे थे। श्रीकृष्ण को इस तरह भीष्म के संहार के लिए बढ़ते हुए देखकर उन्हें बड़ी लज्जा आयी। उन्होंने श्रीकृष्ण को पकड़ लिया। परन्तु उस पकड़ी हुई हालत में भी अर्जुन को लेकर श्रीकृष्ण दस कदम बढ़ गये। तब हाथ जोड़कर अर्जुन पैरों पर गिर पड़े। कहा, “श्रीकृष्ण, मेरी लज्जा रखो। तुमने कहा था, मैं युद्ध में अस्त्र धारण न करूँगा। तुम्हारी बात मिथ्या होगी। लौट चलो।”

Suryakant Tripathi 'Nirala', Bhishma Pitamah
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