“देश-देशान्तरों से पाण्डव इतना धन बटोर लाये थे कि सोने-चाँदी का पहाड़ लग गया। सभा भवन और उद्यान आदि की रचना का भार मय दानव को सौंपा गया। उस समय वह भारतवर्ष का सर्वश्रेष्ठ कारीगर था। राजसूय से पाण्डव की धाक जम गयी। भारत के सब राजाओं पर उनका आतंक छा गया। दुर्योधन पर तो इतना प्रभाव पड़ा कि यज्ञ की चिन्ता के मारे रात को उसकी आँख भी न लगने लगी। पाण्डवों की दौलत उसके लिए आँखों की किरकिरी हो गयी। उसे हड़प लेने के लिए दिन-रात जी मचलने लगा। परन्तु कोई उपाय न सूझता था। राजसूय यज्ञ में दुर्योधन को भी न्यौता गया था। मय दानव की विचित्र रचना देखकर उसके छक्के छूट गये। एक जगह तो उसकी समझ में न आया कि यह जल है या स्थल। एक जगह स्थल को जल समझकर धोती सिकोड़ने लगा था। यह देखकर भीम कहीं हँस पड़े थे। इससे वह भी जल गया। बदला चुकाने के लिए दिन-रात जी खौलने लगा। पाण्डवों की बढ़ी हुई प्रभुता उसके लिए शूल हो गयी।”
―
Bhishma Pitamah
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