“शान्तनु गंगा को देखकर जितने मुग्ध हो गये थे, उतना मोह गंगा को नहीं हुआ, यद्यपि गंगा की अन्तरात्मा भी शान्तनु से मिलने के लिए अत्यन्त व्याकुल हो रही थी। यह शक्ति गंगा में देवत्व की थी और शान्तनु की वह दुर्बलता, जिसके कारण एकाएक सर्वस्व तक का समर्पण करके वे महाराज से एक मनुष्य की श्रेणी में अपने को समझने लगे थे, मानवीय थी। इसीलिए इस प्रेम के परिणाम में विजय गंगा की ही रही, क्योंकि शान्तनु को गंगा की शर्त मानकर चलना पड़ा। वह शर्त थी—— वसुओं के शाप को स्मरण करके गंगा ने कहा, “महाराज, आपकी इच्छा के अनुसार मैं आपकी सहधर्मिणी होना स्वीकार करती हूँ। मुझे विश्वास है, मेरे साथ रहकर आपको आमोद-प्रमोद में हर तरह की सुविधा होगी। आपके मनोरंजन के लिए मैं सदा ही उत्सुक रहा करूँगी। परन्तु मेरी एक बात अभी से सुन लीजिए। मेरी स्वतन्त्रता पर आपको किसी तरह की रुकावट डालने का अधिकार न रहेगा, न आप मुझे किसी अप्रिय सम्बो- धन से बुला सकेंगे। आप अभी से सोचकर निश्चय कर लीजिए। अगर इस शर्त पर आप दृढ़ रहेंगे, तो मेरा और आपका सम्बन्ध अमिट है, और अगर आपसे इस शर्त का पालन न हो सका, जिस दिन आपकी ओर से उदासीनता या किसी तरह की उपेक्षा का भाव पैदा होगा, उसी दिन मैं आपको छोड़कर अपने अभीप्सित स्थान को चली जाऊँगी।”
―
Bhishma Pitamah
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