“स्वच्छ सलिला भागीरथी के तट पर स्वर्गीय सौन्दर्य पर इतराती हुई, नवयौवना, परम रूपवती एक सुकुमारी षोड्शी को देख चकित हो गये। स्त्री क्या थी चाँदनी की मूर्ति थी। अंग-अंग से लावण्य की सुकुमार धारा बह रही थी। उसकी वे आँखें थीं या सूर्य-बिम्ब पर दो विकसित रश्मियाँ क्रीड़ा कर रही थीं। मुख-मण्डल शान्त सरोवर की तरह उदार हो रहा था, कपोल युगल शीशे की तरह साफ नजर आते थे और उनके उस सुन्दर मुख पर निष्पाप आभा की झलक, झलक रही थी। आभूषणों के बिना भी सुन्दर रूप में तीनों लोक की दृष्टि आकर्षित करने की शक्ति थी। कलिकाओं से व्याकुल लहलही लता-सी उसकी देह मानो यौवन के अपार भार से दब रही थी। चम्पा के दलों-सी कनक-कान्ति छीननेवाली उसकी आँगुलियाँ, लचीली डालियों-सी बाँहें, पीनोन्मत्त उरोज, उस नितम्बिनी की शोभा और भी बढ़ा रहे थे। सबसे अधिक मोहक उसके खुले वायु में तरंगें भरते हुए आजानुलम्बित काले-काले घुँघराले बाल थे। श्वेताम्बरा-षोडशी की मनोमोहिनी मूर्ति पर महाराज शान्तनु मुग्ध हो गये।”
―
Bhishma Pitamah
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