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A.C. Bhaktivedanta

“कष्ट भोगने वाले अनेक मनुष्यों में केवल कुछ ही ऐसे हैं जो वास्तव में अपनी स्थिती जानने के जिज्ञासु हैं, जैसे कि वे क्या हैं, वे इस विषम स्थिति में क्यों डाल दिये गये हैं, आदि-आदि। जब तक मनुष्य को अपने कष्टों के विषय में जिज्ञासा नहीं होती, जब तक उसे यह अनुभूति नहीं होती कि वह कष्ट भोगना नहीं अपितु सारे कष्टों का हल ढूँढना चाहता है, उसे सिद्ध मानव नहीं समझना चाहिए। मानवता तभी शुरू होती है जब मन में इस प्रकार की जिज्ञासा उदित होती है। ब्रह्म-सूत्र में इस जिज्ञासा को ब्रह्म-जिज्ञासा कहा गया है। अथातो ब्रह्म-जिज्ञासा। मनुष्य के सारे कार्यकलाप असफल माने जाने चाहिए, यदि वह परब्रह्म के स्वभाव के विषय में जिज्ञासा न करे। अतएव जो लोग यह प्रश्न करना प्रारम्भ कर देते हैं कि वे क्यों कष्ट उठा रहे हैं, या वे कहाँ से आये हैं और मृत्यु के बाद कहाँ जायेंगे, वे ही भगवद्गीता समझने के सुपात्र विद्यार्थी हैं। निष्ठावान विद्यार्थी में भगवान के प्रति आदर भाव भी होना चाहिए। अर्जुन ऐसा ही विद्यार्थी था।”

A.C. Prabhupāda, Srimad Bhagavad Gita Yatharoop
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Srimad Bhagavad Gita Yatharoop (Hindi Edition) Srimad Bhagavad Gita Yatharoop by A.C. Bhaktivedanta
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