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“कई नरमवादियों ने समझौते की कोशिश की, परंतु रामजन्मस्थान पर विश्व हिंदू परिषद् ने अपनी पकड़ मजबूत कर दी। बाबरी मस्जिद हिंदुओं को देकर समस्या का समाधान करने के लिए मुसलमान नरमवादी तैयार थे, परंतु इसको खुलकर कहने के लिए किसी में हिम्मत नहीं थी। बाबरी मस्जिद पर अपना दावा छोड़ने से वि.हि.प. को फिर आगे बढ़ाने के लिए मुद्दा कुछ नहीं होगा, कुछ मुसलमानों ने ऐसा भी सोचा। इस तरह के विचार आगे बढ़ जाएँ तो समस्या के समाधान की संभावना होती थी। खेद के साथ कहना पड़ेगा कि उग्रपंथी मुस्लिम गुट की मदद करने के लिए कुछ वामपंथी इतिहासकार सामने आए और उन्होंने बाबरी मस्जिद नहीं छोड़ने का उपदेश दे दिया। वास्तव में, उन्हें यह मालूम नहीं था कि कितना बड़ा पाप कर रहे हैं। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के.एस. गोपाल, रोमिला थापर, बिपिन चंद्रा जैसे इतिहासकारों ने ‘रामायण’ के ऐतिहासिक तथ्यों पर सवाल खड़े कर दिए और कहा कि 19वीं सदी के पहले मंदिर तोड़ने का सुबूत नहीं है। उन्होंने अयोध्या को ‘बौद्ध-जैन केंद्र’ कहा। उनका साथ देने के लिए प्रो. आर.एस. शर्मा, अनवर अली, डी.एन. झा, सूरजभान, प्रो. इरफान हबीब आदि भी आगे आए। तब एक बड़े गुट का समर्थन बाबरीवालों को मिल गया।”

K.K. Muhammed, Main Hoon Bharatiya
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Main Hoon Bharatiya (Hindi Edition) Main Hoon Bharatiya by K.K. Muhammed
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