“महत्त्व की बात यह समझना है कि भय क्या है और भय को मिटाया कैसे जाए। भय के कारणों में से एक है ईर्ष्या, और ईर्ष्या है तुलना। तुलना की, ईर्ष्या की बुनियाद पर बना समाज अपने लिए और दूसरों के लिए भी क्लेश ही पैदा करेगा। आपको पता है, एक संतुष्ट व्यक्ति वह नहीं है जिसने अपनी चाही हुई चीज़ को पा लिया है बल्कि संतुष्ट वह है जो सभी बातों को यथावत देख-समझ लेता है और उनसे पार निकल जाता है। पर वस्तुओं को वे जैसी हैं उसी रूप में समझने के लिए यह ज़रूरी है कि आपका मन निरंतर तुलना में, आंकने में, माप-तोल में न उलझा रहे। ऐसा मन चीज़ों को कभी नहीं समझ सकता। इसे सरल ढंग से ऐसे कह सकते हैं कि यदि आपकी तुलना किसी अन्य से की जाती है तो आपका कोई महत्त्व नहीं रहता, या रहता है? उस तुलना में प्रेम नहीं है—कि है? हमारा समाज, हमारे विद्यालय, हमारी शिक्षा, हमारे बड़े-बड़े लोग—उनमें प्रेम नहीं है। इसलिए, हमारा सारा समाज, हमारी सारी संस्कृति टूट कर बिखरती जा रही है, सब कुछ पतन की ओर जा रहा है। इसलिए यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि इस जगह पर, यहां राजघाट में शिक्षक, फाउंडेशन के सदस्यगण और विद्यार्थी इस नयी भावना का सृजन करें।”
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शिक्षा क्या है?
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