तन्हा और खुश रहना
तुम जब पूछते हो कि इस जीवन में स्वयं का परिष्कार करने का ढंग क्या है ? मैं उस वक़्त अपने आपको देखता हूँ. मुझे वहां एक ही बात दिखाई पड़ती है कि मैंने जीवन को साधने के यत्न करने की जगह उसका आनन्द लिया है. ख़ुशी क्या है? ये समझ आये तो उसके लिए जीयो. बस. क्योंकि जीवन को यंत्रों, सींखचों और आदर्शों में बांध कर किसी विशेष रूप में ढालना मुझे अच्छा नहीं लगता. तुम्हें मालूम है कि मेरे पास कई बांसुरियां हैं. मेरे बच्चे उनसे डांडिया खेलने लगते थे. वे प्रिय बांसुरियां टूट जाती थी. मैं नयी बांसुरी ले आता था. जहाँ से बांसुरी खरीदता रहा हूँ वहां बांसुरियां संदूकों के अँधेरे में पड़ी होती थी. मैं उनको छूकर देखता. उनके रंग और आकर को देखकर अपने साथ ले आता. घर लाकर उनको किसी दीवार पर टांग देता या वे मेरी अलमारी में पड़ी रहती थी. जाने कितने ही बरस हुए वे बांसुरियां मेरे साथ हैं. वे मुझे प्रिय हैं मगर मैं उनको बजाता नहीं हूँ. कभी किसी रोज़ कोई बांसुरी मेरे होठों से लगकर बजने लगेगी तब तक के लिए मैं खुद को किसी ऐसे परिश्रम में नहीं झोंकना चाहता हूँ जहाँ मन न हो बस बांसुरी बजाने का गुण आने की चाह हो. मेरी ही तरह तुम ऐसा कोई काम न चुनना जो तुम्हें ख़ुशी देने की जगह सिर्फ मंझा हुआ दिखाने में सहयोगी हो.
मगर बांसुरियां मुझे प्रिय हैं, वे मेरे साथ हैं.
तुम परिष्कृत क्यों होना चाहते हो? क्या ये विचार तुम्हारे अन्दर से आया है? अगर ऐसा नहीं है तो ये चिंता की बात है कि तुम दुनिया को दिखाने के लिए वह सब करना चाहते हो जिसकी तुम्हें ख़ुशी नहीं और जिसके बाद एक कठोर ठहराव है. नृत्य, गायन, वादन, अभिनय, चित्रकला, शिल्प, लेखन जैसी कलाएं मनुष्य को उच्चतर बनती हैं. हर एक कला के भीतर अनेक कलाएं छुपी होती हैं. उनके रस होते हैं. रस निष्पत्ति के विलक्षण तरीके होते हैं. एक ही रस और राग हर मनुष्य में अलग तरीके से बजता और प्रस्फुटित होता है. इस असीमता में तुम एक चीज़ जो सीखना चाहते हो वह कितनी छोटी है. उससे भी बड़ी बात कि वह तुम्हारे मन की नहीं है और जल्द ही एक थकान तुम्हें घेर लेगी. तुम ऊब से भरने लगोगे. इसलिए जब तक भीतर से कोई मचल न हो. भीतर से कोई उकसावा न आये तब तक दुनिया को दिखाने या प्रसंशा पाने के लिए कुछ न करना. वह करना जो अंदर उपजता हो. वह साधना जिसकी सीख हमारा मन ले रहा हो.
मैं चुप हो जाता हूँ, लोगों से दूर चला जाता हूँ. ऐसा अक्सर आस-पास के लोगों को लगता होगा. लेकिन ये सिर्फ बाहरी लक्षण है. असल में मैं अपने पास लौटता हूँ. मेरे लिए मेरा एकांत प्रिय है और उसी से ख़ुशी है. तो आप कहीं जाते नहीं हैं. योग्य-गुणी, अध्यापकों और गुरुओं से कुछ सीखते नहीं हैं. फिर ये जीवन को नष्ट करना न हुआ? मुझे नहीं लगता कि कोई कुछ सिखा सकता है. सिखाना एक अंध क्रिया है. आप एक सुर लगाते हैं और कहते हैं ऐसा ही करो. मैंने सुर की नक़ल की. क्या ये सीखना हुआ? नहीं ये सिर्फ सिखाना हुआ. सीखना तब होगा जब आप सुर लगायेंगे और मैं भीतर से उनसे जुड़ जाऊँगा. फिर मेरा मन उसी सुर को दोहराएगा. एक दिन साध लेगा. अब बताओ सीखना के लिए कहाँ जाना हुआ? कहीं बाहर या अपने भीतर. परिष्कार यानि खुद को निर्मलता की ओर लेजाना. अशुद्ध को त्याग कर शुद्ध होना. ख़राब को बाहर कर अच्छा होना. तो परिष्कार के लिए क्या किया? कहाँ गए, किससे मिले, किसको पढ़ा. सबकुछ खुद का किया ही काम आया. बाहर से दोष आते हैं.
दफ्तरों में काम करने वाले या पूरे समय घर की देखभाल करने वाले पुरुष और स्त्री. वे जो कुछ कर रहे होते हैं वह कितना नीरस और अनुपयोगी जान पड़ता है. कुछ किया ही नहीं. सीखे ही नहीं. व्यर्थ ही सबकुछ. जीवन बीत रहा है. हमें कुछ आता नहीं. लोग देखो क्या क्या जानते हैं. ऐसे सवाल हमारे मन में आते हैं. तब हम कभी खुद से ये नहीं पूछते कि लोगों को क्या आता है? वे किन कारणों से वह सब करते हैं. उससे भी बड़ी बात की उनके किये की आयु क्या है. कितने बरसों और सदियों तक उनके किये को स्मृत किया जायेगा. इसका जवाब बहुत जल्द मिल जाता है. फिर हमारे मन में आता है बाद में कुछ हो न हो मगर अभी तो वह ख़ास है. तब सोचना कि इस ख़ास होने में अगर उसका मन शामिल नहीं है तो? क्या घर में रहने वाले पुरुष और स्त्रियाँ अपना जीवन व्यर्थ कर रहे होते हैं. कभी नहीं. जो कोई जहाँ है जो कुछ करता है वही उसका साध्य हो तो यही परिष्कार है.
मैं फिर कभी तुम्हें चिट्ठी लिखूंगा मगर फिलहाल ये सोचो कि कहीं तुम एक गलत व्यक्ति के साथ तो नहीं हो. जो अपनी ख़ुशी के लिए बाहरी चीज़ों से आकर्षित नहीं है. जो बांसुरी लिए बैठा रहता है और बजाना नहीं सीखता. और ऐसी बांसुरी किस काम की जो मन ही में बजे. मगर है ऐसा ही.
मेरा मक़सद है तन्हा और खुश रहना.
[Painting image courtesy ; Vishal Mishra]
मगर बांसुरियां मुझे प्रिय हैं, वे मेरे साथ हैं.
तुम परिष्कृत क्यों होना चाहते हो? क्या ये विचार तुम्हारे अन्दर से आया है? अगर ऐसा नहीं है तो ये चिंता की बात है कि तुम दुनिया को दिखाने के लिए वह सब करना चाहते हो जिसकी तुम्हें ख़ुशी नहीं और जिसके बाद एक कठोर ठहराव है. नृत्य, गायन, वादन, अभिनय, चित्रकला, शिल्प, लेखन जैसी कलाएं मनुष्य को उच्चतर बनती हैं. हर एक कला के भीतर अनेक कलाएं छुपी होती हैं. उनके रस होते हैं. रस निष्पत्ति के विलक्षण तरीके होते हैं. एक ही रस और राग हर मनुष्य में अलग तरीके से बजता और प्रस्फुटित होता है. इस असीमता में तुम एक चीज़ जो सीखना चाहते हो वह कितनी छोटी है. उससे भी बड़ी बात कि वह तुम्हारे मन की नहीं है और जल्द ही एक थकान तुम्हें घेर लेगी. तुम ऊब से भरने लगोगे. इसलिए जब तक भीतर से कोई मचल न हो. भीतर से कोई उकसावा न आये तब तक दुनिया को दिखाने या प्रसंशा पाने के लिए कुछ न करना. वह करना जो अंदर उपजता हो. वह साधना जिसकी सीख हमारा मन ले रहा हो.
मैं चुप हो जाता हूँ, लोगों से दूर चला जाता हूँ. ऐसा अक्सर आस-पास के लोगों को लगता होगा. लेकिन ये सिर्फ बाहरी लक्षण है. असल में मैं अपने पास लौटता हूँ. मेरे लिए मेरा एकांत प्रिय है और उसी से ख़ुशी है. तो आप कहीं जाते नहीं हैं. योग्य-गुणी, अध्यापकों और गुरुओं से कुछ सीखते नहीं हैं. फिर ये जीवन को नष्ट करना न हुआ? मुझे नहीं लगता कि कोई कुछ सिखा सकता है. सिखाना एक अंध क्रिया है. आप एक सुर लगाते हैं और कहते हैं ऐसा ही करो. मैंने सुर की नक़ल की. क्या ये सीखना हुआ? नहीं ये सिर्फ सिखाना हुआ. सीखना तब होगा जब आप सुर लगायेंगे और मैं भीतर से उनसे जुड़ जाऊँगा. फिर मेरा मन उसी सुर को दोहराएगा. एक दिन साध लेगा. अब बताओ सीखना के लिए कहाँ जाना हुआ? कहीं बाहर या अपने भीतर. परिष्कार यानि खुद को निर्मलता की ओर लेजाना. अशुद्ध को त्याग कर शुद्ध होना. ख़राब को बाहर कर अच्छा होना. तो परिष्कार के लिए क्या किया? कहाँ गए, किससे मिले, किसको पढ़ा. सबकुछ खुद का किया ही काम आया. बाहर से दोष आते हैं.दफ्तरों में काम करने वाले या पूरे समय घर की देखभाल करने वाले पुरुष और स्त्री. वे जो कुछ कर रहे होते हैं वह कितना नीरस और अनुपयोगी जान पड़ता है. कुछ किया ही नहीं. सीखे ही नहीं. व्यर्थ ही सबकुछ. जीवन बीत रहा है. हमें कुछ आता नहीं. लोग देखो क्या क्या जानते हैं. ऐसे सवाल हमारे मन में आते हैं. तब हम कभी खुद से ये नहीं पूछते कि लोगों को क्या आता है? वे किन कारणों से वह सब करते हैं. उससे भी बड़ी बात की उनके किये की आयु क्या है. कितने बरसों और सदियों तक उनके किये को स्मृत किया जायेगा. इसका जवाब बहुत जल्द मिल जाता है. फिर हमारे मन में आता है बाद में कुछ हो न हो मगर अभी तो वह ख़ास है. तब सोचना कि इस ख़ास होने में अगर उसका मन शामिल नहीं है तो? क्या घर में रहने वाले पुरुष और स्त्रियाँ अपना जीवन व्यर्थ कर रहे होते हैं. कभी नहीं. जो कोई जहाँ है जो कुछ करता है वही उसका साध्य हो तो यही परिष्कार है.
मैं फिर कभी तुम्हें चिट्ठी लिखूंगा मगर फिलहाल ये सोचो कि कहीं तुम एक गलत व्यक्ति के साथ तो नहीं हो. जो अपनी ख़ुशी के लिए बाहरी चीज़ों से आकर्षित नहीं है. जो बांसुरी लिए बैठा रहता है और बजाना नहीं सीखता. और ऐसी बांसुरी किस काम की जो मन ही में बजे. मगर है ऐसा ही.
मेरा मक़सद है तन्हा और खुश रहना.
[Painting image courtesy ; Vishal Mishra]
Published on September 10, 2015 01:26
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