न ऊब न प्रतीक्षा


शब्द अपने अर्थ के साथ सम्मुख रखे हुए किस काम के, जब तक वे स्वयं उद् घाटित होकर भीतर प्रवेश करने को आमंत्रित न करते हों।


April 29

जाना, आग के फूल न बरसते, बारिशों के फाहे गिरते तो रेगिस्तान क्या रेगिस्तान होता।

उदास ही सही, ज़िन्दगी सुन्दर चीज़ है।


क्या तुम्हारे पास कोई ऐसी कहानी है।

ज़िंदा शहतूत के तने में नुकीले दांतों वाले मकोड़ों ने घर बना लिया हो। लाल चींटियों ने चाक कर दिए हों पत्ते। बकरियां दो पंजों पर खड़ी होकर जितना चर सकती थीं चर गयी हों। बच्चों ने टहनियों की लचक की सीमा से आगे जाकर तोड़ दिया हो। पेड़ के मालिक ने काले-लाल और कच्चे हरे शहतूत, कुछ तोड़ लिए कुछ मसल दिए। और वो जो शहतूत का कीड़ा होता है उसकी भी कोई बात शामिल हो।


April 28

तुम एक पिरोये हुए फूल हो। दिल बेवकूफ़, अपने ठिकाने पड़े रहो।

अतीत की जाली छनकर गिरने नहीं देती, फटकती रहती है भविष्य की ओर उछाल-उछाल कर।

अचानक किसी दोपहर हम खुद को पाएं खाली पड़े हुए पुराने प्याले की तरह। नमी, नाज़ुकी, ज़िन्दगी जैसा कुछ न बचा हो। बस हम पड़े हों बिना हरकत, बिना जान के।

तो....


अभी-अभी एक सूखा पत्ता गली से दौड़ता हुआ गुज़रा। आखिरी छोर पर दीवार के पास कोने में बैठे खालीपन ने उसे अपने करीब खींचकर छुपा लिया।

आओ मोहोब्बत करें। शायद यही कहा होगा।


काश मैं लिख पाता कि रेगिस्तान में कहीं किसी घर की छत पर बैठा हुआ एक आदमी कैसा दिखता है। ताज़ा बोसों के दो हल्के निशान और उसकी आत्मा पर पड़ी हुई अतीत के अनगिनत बोसों की मोहरें कैसी दिखती है। क्या उसके पास बची है किसी रूमान की दिलफ़रेब याद।

काश लिख सकूँ कि खर्च होते-होते कितना बचा है वह आदमी। जो रेगिस्तान में कहीं किसी छत पर बैठा है।


April 26

हर रंग की शाम एक दिन बिखर पड़ेगी तुम्हारे आस-पास। ख़ुशी या तकलीफ से भरी। प्रेम या इंतज़ार से भीगी। गहरे अफ़सोस या बेहिसाब सुकून से भरी।

जो नहीं हुआ, वह होगा।

आज शाम को डूबते हुए सूरज को देखा। ये भी एक अरसे से बाक़ी था।

धूप के शबाब में स्टेशन रोड पर उल्फ़त की दुकाँ के आगे एक ट्रॉली भरी पड़ी है शर्तिया दवा से। दवा बेचते उदास सांवले लड़के के चेहरे पर लिखा है नाउम्मीद इंतज़ार। एक रॉयल एनफील्ड मेरे आगे चलती हुई। नौजवान लड़का धूप का चश्मा चढ़ाये अपने मेरुदण्ड पर तना हुआ। मारवाड़ी पोशाक में गहरे रंग के घाघरे पर लहरिया ओढ़े मोटर सायकिल पर पीछे बैठी औरत की गोद में तोलिये में लिपटा हुआ रेगिस्तान का एक नन्हा बाशिंदा। एनफील्ड की कर्णप्रिय राजसी आवाज़ और सायलेंसर से आते हवा के स्ट्रोक्स मेरे हेलमेट को छूकर बिखरते हुए। मन फिर से स्टेशन रोड का फेरा देता हुआ अचानक जेल के पास से आकाशवाणी की तरफ मुड़ जाता है। नीम के नीचे रुकते ही सोचता हूँ कहाँ आये हो केसी और फिर कहाँ जाओगे।

ज़िन्दगी सा सूदखोर कोई नहीं।

बंद बात की ख़ुशबू सबसे अधिक मादक होती है।

आओ चुपचाप।


उदासी कि शाम, जाने कौन किसके कांधे पर सर टिकाये था।


दूर होने से क्या हो जाता है दूर, पास होकर भी सब कहाँ कुछ पास होता है?

आज तुम जहाँ हो उम्र भर वहीँ रहोगे।

April 25

गमले में पसरी उदासी के बीच कोई हरापन झांकने लगता है। उसे देखकर गमले के धूसर रंग में हरे रंग की झाईं खिलने लगती है। कुछ रोज़ में धूसर और हरा रंग आपस में मिलकर एक नया रंग हो जाते हैं। और आदतन पौधे के याद आता है कि वह आकाश की ओर बढ़ने के लिए दुनिया में आया है। गमला कहता है तुम इतने ही ठीक हो। तुम और बढे तो मैं टूट जाऊँगा। एक आज़ादी का सवाल एक ज़िन्दगी के सवाल पर भारी हो जाता है। कुछ रोज़ की लड़ाई के बाद गमला उस खूबसूरत पौधे को आज़ाद ज़मीन में रख देता है। ऐसे ही सालों बाद जब हवा पानी ठीक होते गमले में कोई नया रंग खिल जाता। हरियल पौधे आज़ाद आकाश की ओर बढ़ते जाते।

सबकी अपनी चाहनाएं, सबकी अपनी नियति।

जिन घुंघरुओं के अंदर बीज नहीं होता। उनको खनकने के लिए दीवारों से सर फोड़ना पड़ता है।


जो कभी टूटा न हो, वो प्यार नहीं है। वो दो तरफा ऋण है जिसकी किश्तें बराबर चुकाई जा रही हैं।


वह न ऊब में है न किसी प्रतीक्षा में। न ही वह ध्यान के आनंद में है। वह बस जिस तरह बनी उसी तरह ठहरी हुई है। इस ठहराव पर गिरी किसी नज़र की छुअन। मद्धम, विलम्बित अथवा द्रुत। लरज़िश। कोई अनगढ़-सुघड़ आवृति। टंकार का सुरीला गान। और फिर ख़ामोशी। ताकि सेंसेज़ को जगा कर जो अभी गुज़रा उसे पढ़ा जा सके। वह एक सुर था, जो ठहराव के भीतर जगा। जिसने ठहराव के छद्म को तोड़ा। जिसने विस्मय से भर दिया किसी धातु को किसी जीवन को।

वही प्रेम है।

जैसे हवा ने किसी को छुआ। जैसे मैंने फेरी तुम्हारी तस्वीर के रंगों पर अपनी अंगुलियां।


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Published on May 01, 2015 21:41
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Kishore Chaudhary
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