मंगलभव कि लानतें भेजते हैं हज़ार वो
प्रेम की दूकान अभी मंगल है.
असल में मंगल होने का अर्थ है कि शटर डाउन है, इसे बंद होना कहना अशुभ है. प्रेम का रास्ता रोकना अमंगल है. एक बेसिक फोन की ज़रूरत न थी अगर प्रेम की चाह न हुई होती. अब क्या है कि इन्टरनेट की थ्री जी स्पीड भी कम लगती है. कहीं प्रेम का न्यूनतम भाग भी छूट न जाये. बड़ी बेसब्री रहती है. मैंने कई सारे ऑपरेटर आजमाए. ऐसा समझिए कि जो कोई इंटरनेट बेचता था उसको आजमा लिया. इसलिए थोड़े कि कोई धंधा पानी चलता है. सिर्फ प्रेम की कामना में. याहू मेसेंजर से लेकर अब तक के अतिद्रुत-तीव्रतितीव्रगामी लघुसन्देश आवक जावक साधनों पर हर क्षण उपस्थित रहा हूँ. इलसिए नहीं कि लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना के प्रयास कर रहा हूँ बस इसलिए कि ज़रा सा प्रेम मिल जाये.
कुछ समय फेसबुक के इस प्रोफाइल से अनुपस्थित रहने के कारण मित्रों में जिज्ञासा हुई कि कहाँ थे? मुझे उन मित्रों के लिए कोई खास चिंता नहीं जो मेरे अनुपस्थित होने को कोई ज़रुरी काम समझ सकें. जैसे बेटी कॉलेज में पढ़ती है, उसके लिए कुछ चिंता होगी. पत्नी की सरकारी नौकरी में कोई नया पेच न आये. एक सरकारी नौकर बेचारा कहीं हाजिरी भर रहा होगा, घर बना रखा है तो उसकी कुछ चीज़ें चाहियें होंगी, शराब पीता है तो उसका जुगाड़ भी मुश्किल ही है आदि. असल चिंता उन मित्रों के लिए है जो ये जानना चाहते होंगे कि अब किसके साथ इश्क लड़ा रहा होगा. उन्होंने इस बेचैनी में कई कई जगह बेशर्म होकर पूछ लिया होगा कि केसी को कहीं देखा है. सामने वाले ने जब कोई जवाब न दिया होगा तो कहा- ऐसे बेशर्मों का क्या है? कहीं भी हो सकते हैं पतित कामी लोग.
अभी हुआ क्या कि पांच सात स्त्रियां आपस में टकराई और उनका कॉमन फेक्टर मैं निकला. मेरे गुनाह बड़े सीधे शब्दों में बयान किये जा सकते थे किन्तु मन से कारीगर स्त्रियों ने मिलकर कई संज्ञाओं और विशेषणों को लगाकर उनको क्लिष्ट बना दिया. मैं आपको ईमान से बता देता हूँ. कुल दो आरोप थे. पहला आरोप था कि मैंने उनको आई लव यू कहा है और इसकी आवृति घनघोर थी. दूसरा आरोप था कि मैंने एक ही समय में कईयों के साथ यही क्रिया दोहराई है. इन्हीं दो आरोपों की बुनियाद पर कई नए सम्बन्ध खड़े हुए. बैठकें हुई. न्यायिक आयोगों ने सबूतों का आदान प्रदान किया. तलाशियां जारी की गयीं. जामे खंगाले गए. और अंततः एक राय होकर सबने जो फैसला किया वह मुझे नहीं सुनाया गया.
इसी प्रतीक्षा में मैंने अपना हाल लिखा “मोपासा का मुर्गा और तीन नाज़ुक दिल किसान” इसे कहीं प्रकाशित और वितरित नहीं किया. ये सिर्फ लिखने भर को लिखा. ऐसा इसलिए कि जब भी मुझे कोई शिकायत होती थी पापा कहते कि रोनी सूरत न बनाओ. लिखकर बताओ कि शिकायत क्या है. वे एक अनुभवी अध्यापक थे, जानते थे कि लिखने पर आते ही सारा ड्रामा खत्म और असल में 'खोदा पहाड़ निकली चुहिया' वाला मामला हो जायेगा. मैंने पापा से इस बात पर कट्टी कर रखी थी कि सब बातें लिखी नहीं जा सकती. उनका कहना था कि जो बात लिखी नहीं जा सकती वह या तो अपराध है या कायरता. मैंने इसे कायरता के खाने में रखा और लिखना कभी नहीं चाहां. एक बार जब बात करने को कोई न था तब यही आखिरी उपाय था. मैंने लिखना शुरू किया. लिखते-लिखते कुछ ऐसी बातें समझ आई कि लिखना क्या हो सकता है.
दिक्कत कहाँ होती? वहाँ, जहाँ कोई हमपेशा टकरा जाये. वे न्यायिक आयोग वाली दोस्त और महबूबाएं तो ठीक ही हैं मगर कुछ एक ने मेरी तरह पीने की आदतें पाली हुई हैं. वे जहाँ कहीं पार्टी में होती हैं मैं समझ जाता हूँ कि उस पार्टी का समापन इस बात से हो रहा होगा. “यार कुछ भी हो तुम्हारा दोस्त तो वही है न? फ्लर्ट!!.” मैं दुखी होता कि दुनिया भर के प्रेमियों को कैसे कैसे संबोधनों से दो चार होना पड़ता है. इधर कोई योरोप से क़तर संदेसा भेजता- “रहने दो यार मैंने आजमाया हुआ है. हाँ ठीक है नुकसान कुछ न किया, कोई तकलीफ न दी मगर बेवफा आदमी है. देखना कल कहीं और दिखाई देगा.” उनकी भविष्यवाणियां सच हो जाती. इस पर वे कभी प्रसन्न नहीं हो पाती कि जो उन्होंने कहा वह सच ठहरा, वे कहती हैं- देखो मैंने कहा था न? और फिर उदास हो जाती. लानतें भेजती.
ऐसे ही दोस्तों महबूबों को सोचते हुए कुछ महीने बीते हैं. मैंने सोचा था कहानी लिखूंगा. दिसम्बर तक किताब पूरी मगर अब तक दो ड्राफ्ट बने हैं. आभा ने पढकर एप्रूव कर दिए हैं. कहती है लिखा करो आपको खूब वक्त मिलता है. मैं कहता हूँ मेरे पास लिखने से ज्यादा ज़रुरी काम है प्रेम करना. और इस बात को ऐसे कहता हूँ जैसे सारी कायनात का प्रेम अभी उसी पर उड़ेल दूं. ये झूठ थोड़े ही होता है. ये सच होता है. झूठा कभी ज्यादा दिन स्वांग नहीं कर सकता. सच्चा ही हमेशा नए से नए प्रेम को खोज सकता है.
हम असल में दोगले नहीं हैं. हम कई कई तरह से गले हुए हैं. हमारे आचरण में शुचिता दिखावे भर के लिए है. हम बातें खूब अच्छी करते हैं. हम हर कहीं अपने पक्ष को उजला रखने के लिए असत्य की स्याही को बरतते रहते हैं. अपने काले हाथों को जेबों में छुपाये घूमते हुए अक्सर दूसरों के काले चेहरों की ओर ध्यान आकृष्ट करते रहते हैं. मैं एक कहानी लिख रहा था. उसे मैंने स्थगित कर दिया. इसलिए कि कथ्य एक ऐसी स्त्री के बारे में था जो चारित्रिक सर्वांग श्वेत है और अश्वेत विवाहेत्तर सम्बन्ध को सिरे से ख़ारिज करती है. लेकिन वही स्त्री आगे चलकर एक बिचोलिये की भूमिका को अपना लेती है. मैंने दलाल शब्द का उपयोग इलसिए नहीं किया कि ये ज्यादा सस्ता जान पड़ता है. ये मेरे लिए एक गहरा अनुभव था कि व्यक्ति अपने दिखावे के भीतर से किस तरह अलग होता है. वह जो एक दृढ प्रतिज्ञ है, वह जो संबंधों को पवित्रता के पैमाने पर खरा आंक कर जीवन जीता है, वह किस व्याधि से ऐसे पेशे में उतर आता है. जो स्त्री स्वयं अपने जीवन में विवाहेत्तर संबंधों की पक्षधर नहीं है वही स्त्री एक अन्य विवाहित स्त्री को चाहने वाले एक व्यक्ति की पक्षधर होकर उनके सम्बंध बनवाने, एक दूजे तक हाल पहुंचाने के काम में लग जाती है. इसके बाद आगे कहानी में घटना कुछ नहीं है. बस एक लम्हा है कि उसकी भी एक बेटी है. उसके दिमाग में एक पल के लिए आता है कि क्या उसकी बेटी को अगर कोई बिचोलिया औरत इस तरह के संबंधों के लिए प्रेरित करेगी तब वह क्या करेगी.
इससे आगे जो कहानी है वह मुझे भेदती हुई गुजरती है कि मैं भी एक बेटी का पिता हूँ और कभी नहीं चाहता कि दोस्तों की शक्ल में वह शातिर दलालों के हाथ लग जाये.
देखिये हम जो नकाब ओढ़े हुए जीते हैं. "गे कल्चर" पर अच्छे कार्यक्रम देखते हैं. उसे देखते हुए कभी आँखें भिगो बैठते हैं. कभी उसकी नपे तुले शब्दों में तरफदारी करते हैं. कभी हम व्यक्ति की आज़ादी की बहस में कूद पड़ते हैं. हम उसके मौलिक अधिकारों को यहाँ तक बता देते हैं कि कोई अपना जीवन बरबाद करने में खुश है तो उसे करने दिया जाये. हम हर हाल में दूजों के लिए प्रगतिशील और खुद के लिए जड़ता की हद तक रूढ़िवादी बने रहते हैं. मनुष्य के लिए चाहना एक स्वाभाविक जींस से उत्पादित है. हम सब कहीं न कहीं किसी के सम्मोहन में पड़ जाते हैं. विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण को हमारी देह में कुदरत ने ही डालकर दिया है. ये इस जगत को हांकने के लिए आवश्यक है. इसी प्रक्रिया में सामाजिक होना एक ज़रुरी तत्व है. ये तत्व हमें अराजकता से बचाता है. लेकिन असल में किसी को चूम लेने या मन से चाह कर उसके सहवास में होने की सामाजिक नियमावली कुदरत की नहीं बनायीं हुई है.ये शातिर लोगों ने तय किया है. इसलिए हम इसे दबंगई के हिसाब से परिभाषित करते हैं. जो जितना हांक सके हांकता है और स्त्री ही इकलौती जींस है जिस पर हांक लगायी जाती है. जिस इक्कीसवीं सदी का इंतज़ार था उसमें भी कुछ जगहों पर पुरुषों को देख लेने भर से स्त्री को फांसी के फंदे पर लटका दिया जाता है. वहीँ कुछ समाज सहवास से अधिक सत्यता पर आधारित नियमों की पैरवी से जीवन का आरोहण करते हैं.
कई साल पहले जब मेरी कहानियां ब्लोगर पर आनी शुरू हुई तब मुझे कई दोस्तों ने कहा कि आपकी कहानियों के मुख्य पात्र स्त्रियां और उनके दुःख ही क्यों होते हैं. इसलिए कि मैं स्त्रियों के आस पास मंडराता रहा हूँ. मैंने उनको देखा, सुना, चाहा, चूमा, प्यार किया. मेरे जीवन के सबसे अच्छे अनुभव उन्हीं के दिए हुए हैं. मुझे उन्होंने कभी दुःख न दिए. उन्होंने मेरी झोली में जो भी रखा वह एक अनुभव भर है कड़वा या मीठा. मैं यकीनन फिर से किसी प्रेम में पडूंगा. इस बार किसी बेहद कम उम्र की बच्ची के प्रेम में. जो सैंकडों अंकुश और लाखों नादानियाँ लिए हुए होती हैं. मगर फिलहाल दूकान मंगल है.
ये पोस्ट के साथ लगी हुई पेंटिंग की तस्वीर गूगल से ली है. इसमें मुझे क्या समझ आया कि धरती के कारोबार से ज़रा ऊपर इकहरा आशियाँ बना हुआ है और एक व्यक्ति छतरी लिए किसी का इंतज़ार कर रहा है. मुझे ये नफ़रत और धूर्तता से परे प्रेम में होने की प्रतीक्षा की पेंटिंग लगती है.
असल में मंगल होने का अर्थ है कि शटर डाउन है, इसे बंद होना कहना अशुभ है. प्रेम का रास्ता रोकना अमंगल है. एक बेसिक फोन की ज़रूरत न थी अगर प्रेम की चाह न हुई होती. अब क्या है कि इन्टरनेट की थ्री जी स्पीड भी कम लगती है. कहीं प्रेम का न्यूनतम भाग भी छूट न जाये. बड़ी बेसब्री रहती है. मैंने कई सारे ऑपरेटर आजमाए. ऐसा समझिए कि जो कोई इंटरनेट बेचता था उसको आजमा लिया. इसलिए थोड़े कि कोई धंधा पानी चलता है. सिर्फ प्रेम की कामना में. याहू मेसेंजर से लेकर अब तक के अतिद्रुत-तीव्रतितीव्रगामी लघुसन्देश आवक जावक साधनों पर हर क्षण उपस्थित रहा हूँ. इलसिए नहीं कि लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना के प्रयास कर रहा हूँ बस इसलिए कि ज़रा सा प्रेम मिल जाये.
कुछ समय फेसबुक के इस प्रोफाइल से अनुपस्थित रहने के कारण मित्रों में जिज्ञासा हुई कि कहाँ थे? मुझे उन मित्रों के लिए कोई खास चिंता नहीं जो मेरे अनुपस्थित होने को कोई ज़रुरी काम समझ सकें. जैसे बेटी कॉलेज में पढ़ती है, उसके लिए कुछ चिंता होगी. पत्नी की सरकारी नौकरी में कोई नया पेच न आये. एक सरकारी नौकर बेचारा कहीं हाजिरी भर रहा होगा, घर बना रखा है तो उसकी कुछ चीज़ें चाहियें होंगी, शराब पीता है तो उसका जुगाड़ भी मुश्किल ही है आदि. असल चिंता उन मित्रों के लिए है जो ये जानना चाहते होंगे कि अब किसके साथ इश्क लड़ा रहा होगा. उन्होंने इस बेचैनी में कई कई जगह बेशर्म होकर पूछ लिया होगा कि केसी को कहीं देखा है. सामने वाले ने जब कोई जवाब न दिया होगा तो कहा- ऐसे बेशर्मों का क्या है? कहीं भी हो सकते हैं पतित कामी लोग.
अभी हुआ क्या कि पांच सात स्त्रियां आपस में टकराई और उनका कॉमन फेक्टर मैं निकला. मेरे गुनाह बड़े सीधे शब्दों में बयान किये जा सकते थे किन्तु मन से कारीगर स्त्रियों ने मिलकर कई संज्ञाओं और विशेषणों को लगाकर उनको क्लिष्ट बना दिया. मैं आपको ईमान से बता देता हूँ. कुल दो आरोप थे. पहला आरोप था कि मैंने उनको आई लव यू कहा है और इसकी आवृति घनघोर थी. दूसरा आरोप था कि मैंने एक ही समय में कईयों के साथ यही क्रिया दोहराई है. इन्हीं दो आरोपों की बुनियाद पर कई नए सम्बन्ध खड़े हुए. बैठकें हुई. न्यायिक आयोगों ने सबूतों का आदान प्रदान किया. तलाशियां जारी की गयीं. जामे खंगाले गए. और अंततः एक राय होकर सबने जो फैसला किया वह मुझे नहीं सुनाया गया.
इसी प्रतीक्षा में मैंने अपना हाल लिखा “मोपासा का मुर्गा और तीन नाज़ुक दिल किसान” इसे कहीं प्रकाशित और वितरित नहीं किया. ये सिर्फ लिखने भर को लिखा. ऐसा इसलिए कि जब भी मुझे कोई शिकायत होती थी पापा कहते कि रोनी सूरत न बनाओ. लिखकर बताओ कि शिकायत क्या है. वे एक अनुभवी अध्यापक थे, जानते थे कि लिखने पर आते ही सारा ड्रामा खत्म और असल में 'खोदा पहाड़ निकली चुहिया' वाला मामला हो जायेगा. मैंने पापा से इस बात पर कट्टी कर रखी थी कि सब बातें लिखी नहीं जा सकती. उनका कहना था कि जो बात लिखी नहीं जा सकती वह या तो अपराध है या कायरता. मैंने इसे कायरता के खाने में रखा और लिखना कभी नहीं चाहां. एक बार जब बात करने को कोई न था तब यही आखिरी उपाय था. मैंने लिखना शुरू किया. लिखते-लिखते कुछ ऐसी बातें समझ आई कि लिखना क्या हो सकता है.
दिक्कत कहाँ होती? वहाँ, जहाँ कोई हमपेशा टकरा जाये. वे न्यायिक आयोग वाली दोस्त और महबूबाएं तो ठीक ही हैं मगर कुछ एक ने मेरी तरह पीने की आदतें पाली हुई हैं. वे जहाँ कहीं पार्टी में होती हैं मैं समझ जाता हूँ कि उस पार्टी का समापन इस बात से हो रहा होगा. “यार कुछ भी हो तुम्हारा दोस्त तो वही है न? फ्लर्ट!!.” मैं दुखी होता कि दुनिया भर के प्रेमियों को कैसे कैसे संबोधनों से दो चार होना पड़ता है. इधर कोई योरोप से क़तर संदेसा भेजता- “रहने दो यार मैंने आजमाया हुआ है. हाँ ठीक है नुकसान कुछ न किया, कोई तकलीफ न दी मगर बेवफा आदमी है. देखना कल कहीं और दिखाई देगा.” उनकी भविष्यवाणियां सच हो जाती. इस पर वे कभी प्रसन्न नहीं हो पाती कि जो उन्होंने कहा वह सच ठहरा, वे कहती हैं- देखो मैंने कहा था न? और फिर उदास हो जाती. लानतें भेजती.
ऐसे ही दोस्तों महबूबों को सोचते हुए कुछ महीने बीते हैं. मैंने सोचा था कहानी लिखूंगा. दिसम्बर तक किताब पूरी मगर अब तक दो ड्राफ्ट बने हैं. आभा ने पढकर एप्रूव कर दिए हैं. कहती है लिखा करो आपको खूब वक्त मिलता है. मैं कहता हूँ मेरे पास लिखने से ज्यादा ज़रुरी काम है प्रेम करना. और इस बात को ऐसे कहता हूँ जैसे सारी कायनात का प्रेम अभी उसी पर उड़ेल दूं. ये झूठ थोड़े ही होता है. ये सच होता है. झूठा कभी ज्यादा दिन स्वांग नहीं कर सकता. सच्चा ही हमेशा नए से नए प्रेम को खोज सकता है.
हम असल में दोगले नहीं हैं. हम कई कई तरह से गले हुए हैं. हमारे आचरण में शुचिता दिखावे भर के लिए है. हम बातें खूब अच्छी करते हैं. हम हर कहीं अपने पक्ष को उजला रखने के लिए असत्य की स्याही को बरतते रहते हैं. अपने काले हाथों को जेबों में छुपाये घूमते हुए अक्सर दूसरों के काले चेहरों की ओर ध्यान आकृष्ट करते रहते हैं. मैं एक कहानी लिख रहा था. उसे मैंने स्थगित कर दिया. इसलिए कि कथ्य एक ऐसी स्त्री के बारे में था जो चारित्रिक सर्वांग श्वेत है और अश्वेत विवाहेत्तर सम्बन्ध को सिरे से ख़ारिज करती है. लेकिन वही स्त्री आगे चलकर एक बिचोलिये की भूमिका को अपना लेती है. मैंने दलाल शब्द का उपयोग इलसिए नहीं किया कि ये ज्यादा सस्ता जान पड़ता है. ये मेरे लिए एक गहरा अनुभव था कि व्यक्ति अपने दिखावे के भीतर से किस तरह अलग होता है. वह जो एक दृढ प्रतिज्ञ है, वह जो संबंधों को पवित्रता के पैमाने पर खरा आंक कर जीवन जीता है, वह किस व्याधि से ऐसे पेशे में उतर आता है. जो स्त्री स्वयं अपने जीवन में विवाहेत्तर संबंधों की पक्षधर नहीं है वही स्त्री एक अन्य विवाहित स्त्री को चाहने वाले एक व्यक्ति की पक्षधर होकर उनके सम्बंध बनवाने, एक दूजे तक हाल पहुंचाने के काम में लग जाती है. इसके बाद आगे कहानी में घटना कुछ नहीं है. बस एक लम्हा है कि उसकी भी एक बेटी है. उसके दिमाग में एक पल के लिए आता है कि क्या उसकी बेटी को अगर कोई बिचोलिया औरत इस तरह के संबंधों के लिए प्रेरित करेगी तब वह क्या करेगी.
इससे आगे जो कहानी है वह मुझे भेदती हुई गुजरती है कि मैं भी एक बेटी का पिता हूँ और कभी नहीं चाहता कि दोस्तों की शक्ल में वह शातिर दलालों के हाथ लग जाये.
देखिये हम जो नकाब ओढ़े हुए जीते हैं. "गे कल्चर" पर अच्छे कार्यक्रम देखते हैं. उसे देखते हुए कभी आँखें भिगो बैठते हैं. कभी उसकी नपे तुले शब्दों में तरफदारी करते हैं. कभी हम व्यक्ति की आज़ादी की बहस में कूद पड़ते हैं. हम उसके मौलिक अधिकारों को यहाँ तक बता देते हैं कि कोई अपना जीवन बरबाद करने में खुश है तो उसे करने दिया जाये. हम हर हाल में दूजों के लिए प्रगतिशील और खुद के लिए जड़ता की हद तक रूढ़िवादी बने रहते हैं. मनुष्य के लिए चाहना एक स्वाभाविक जींस से उत्पादित है. हम सब कहीं न कहीं किसी के सम्मोहन में पड़ जाते हैं. विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण को हमारी देह में कुदरत ने ही डालकर दिया है. ये इस जगत को हांकने के लिए आवश्यक है. इसी प्रक्रिया में सामाजिक होना एक ज़रुरी तत्व है. ये तत्व हमें अराजकता से बचाता है. लेकिन असल में किसी को चूम लेने या मन से चाह कर उसके सहवास में होने की सामाजिक नियमावली कुदरत की नहीं बनायीं हुई है.ये शातिर लोगों ने तय किया है. इसलिए हम इसे दबंगई के हिसाब से परिभाषित करते हैं. जो जितना हांक सके हांकता है और स्त्री ही इकलौती जींस है जिस पर हांक लगायी जाती है. जिस इक्कीसवीं सदी का इंतज़ार था उसमें भी कुछ जगहों पर पुरुषों को देख लेने भर से स्त्री को फांसी के फंदे पर लटका दिया जाता है. वहीँ कुछ समाज सहवास से अधिक सत्यता पर आधारित नियमों की पैरवी से जीवन का आरोहण करते हैं.
कई साल पहले जब मेरी कहानियां ब्लोगर पर आनी शुरू हुई तब मुझे कई दोस्तों ने कहा कि आपकी कहानियों के मुख्य पात्र स्त्रियां और उनके दुःख ही क्यों होते हैं. इसलिए कि मैं स्त्रियों के आस पास मंडराता रहा हूँ. मैंने उनको देखा, सुना, चाहा, चूमा, प्यार किया. मेरे जीवन के सबसे अच्छे अनुभव उन्हीं के दिए हुए हैं. मुझे उन्होंने कभी दुःख न दिए. उन्होंने मेरी झोली में जो भी रखा वह एक अनुभव भर है कड़वा या मीठा. मैं यकीनन फिर से किसी प्रेम में पडूंगा. इस बार किसी बेहद कम उम्र की बच्ची के प्रेम में. जो सैंकडों अंकुश और लाखों नादानियाँ लिए हुए होती हैं. मगर फिलहाल दूकान मंगल है.
ये पोस्ट के साथ लगी हुई पेंटिंग की तस्वीर गूगल से ली है. इसमें मुझे क्या समझ आया कि धरती के कारोबार से ज़रा ऊपर इकहरा आशियाँ बना हुआ है और एक व्यक्ति छतरी लिए किसी का इंतज़ार कर रहा है. मुझे ये नफ़रत और धूर्तता से परे प्रेम में होने की प्रतीक्षा की पेंटिंग लगती है.
Published on November 08, 2014 21:08
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