सुनो तो गांधारी

मौसमों के सब फूल खिले, आँगन, देहरी और दीवार. रंग न आये तो गंध तो आती होगी, बंद आँखों के पार. धिक्कार के बाद, अपनत्व की चोट के बाद, अहंकार के बाद, आदि से अनादी तक पसरे मोह के बाद, धर्म, युद्ध, घात, हानि, मृत्यु. सबकुछ के लिए. उजाड़ों में वीरानों में, हकीकत में बहानों में, कोई तो गंध होगी, कोई दृश्य तो उस गंध से सूझता होगा, कोई लहू, कोई उदासी, क्या कोई भी भय नहीं खिला. भारी सांस कहीं-कहीं रुकी तो नहीं, उदास मन कहीं बुझा तो नहीं, कभी किसी पल आई किसी की याद, कभी सोचा कि इसके बाद हथेलियों में क्या रखा होगा. 
गांधारी गांधारी, कहो तो गांधारी मुझे क्यों मुश्किल है खुली आँख से जीना. * * *
दूर आसमान के कोने में
तारे ने भरा प्याला
चाँद की बेरुखी के नाम।

कहो और क्या बचा है काम।
* * *

शुभ लाभ कह कर
नहीं किया जा सका प्रेम का आरम्भ
वह तो अचानक
सर्दी की पहली हवा की तरह आया।

जैसे
कोई पानी से भरी मटकी
फूट पड़ी हो पनिहारिन के सर
भीगे बदन से अचानक
निकली हो जादुई भाप।

जैसे अचानक
भर गयी हो बेरी, कच्चे हरे बेर से
कोई बतुलिया भर गया हो रेत से।

अब भीगी-भीगी आँखें हैं
टूटा-टूटा मन है
खट्टे-खट्टे दिन है, रेत-रेत रात है।

शुभ ये है कि मरे नहीं, लाभ ये है कि ज़िन्दा हैं।
* * *
[Image ; Copy of painting Queen Gandhari – Original Nand lal Bose]
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Published on September 30, 2014 20:11
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Kishore Chaudhary
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