लापरवाही के विलोम में

मैं अक्सर सोचता हूँ कि लापरवाही की भी क्या कोई हद होती है? जैसे मैं अपनी सेहत को लेकर हद दर्ज़े की लापरवाही में पड़ा रहता हूँ. अपनी परवाह करना असल में नैसर्गिक होता है. जैसे हमसे कोई चीज़ टकराने वाली हो तभी हमारा शरीर कोई ऐसी हरकत करता है कि हम उस टकराने वाले चीज़ से बच सकें. अचानक कोई जीव हमारी आँख की तरफ आता है तो पलकें अपने आप बंद होने लगती है. हमारा शरीर जब भी किसी अलग तापमान के संपर्क में आता है हम चौंक कर उससे दूर हो जाते हैं. ये कुछ बातें ख़याल में आते ही मैं आसान होने लगता हूँ.
कुछ ऐसा है जो मेरी लापरवाही भरी दिनचर्या में सावचेत है.
हम अपने हाथों को झटकते जाते हैं. हर गुनाह के बाद उनको साफ़ करते हैं. उनके सब निशाँ मिटाते हैं. उस वक्त समझते हैं कि अब हाथ धुले धुले रहना ही अच्छा है. इस प्यारे से गुनाह के बारे में कभी किसी को क्यों बताना पड़ेगा. मन और आत्मा दोनों ने मिलकर जो आनंद किया उसके बारे में कौन जानता है और किसको सफाई देनी है. इसलिए हम मिटाते जाते हैं. असल में मिटाने से ये सुख भी आता है कि जीवन बड़ा साफ़ दीखता है. इसलिए मिटाना अच्छा है.
इस तरह क्या मिट जाता है सब कुछ.
मैंने अचानक अपने सब ठिकानों पर पाया कि जिनको मैं मिटा चुका था वे वास्तव में सलीके से पूरे के पूरे बचे हैं. निजी तस्वीरें, उनमें हमारी अनदेखी छवियाँ, बातें और सिलसिले से पेश आये लम्हे सबकुछ सुरक्षित. मैं अचानक से कुदरत के इस हुनर का शुक्रिया अदा करता हूँ. वे जाने कैसे पल रहे होंगे कि मेरे अवचेतन ने सबसे सुकून भरे पलों में भी उन चीज़ों को बखूबी बचाया. जैसे मेरे भीतर कोई और भी रहता है. जो ये जानता है कि ये काम की चीज़ें हैं. इनको अपने बचे रहने के लिए बचाए रखो. तो क्या हम सचमुच लापरवाह होते हैं?
वस्तुतः मुझे लगता है कि हमारी बुनावट इतनी पेचीदा इसलिए ही कही जाती है कि हम जो काम जाहिरा तौर पर करते हैं उसके समानांतर एक अनदेखा काम भी चलता रहता है. जैसे कि लोग कहते हैं दिल की सुनो या दिमाग की. तो जब हम दिल की सुन रहे होते हैं तब हमारा दिमाग इस बेवकूफी पर खफ़ा हुआ लगातार प्रिकोशन’स लेता रहता है. जब हम दिमाग की सुनते हैं तब हमारा ह्रदय उन अनुभूतियों को बचाए रखने के लिए लड़ता है. वह लगातार हमें उदासी, नाखुशी और बेचैनी के संकेत देता है.
लापरवाही असल में आनंद के अतिरेक में होना भर है. ये कोई गफलत नहीं वरन एक आश्वस्ति है जिसे एक दिन टूटना ही होता है.
इस टूटन के बाद हम कहाँ जायेंगे. कई बार कुछ लोगों को मैंने कहते हुए सुना कि मैं पागल था जो मैंने सब कुछ उसके लिए लगा दिया. किसी एक साझा काम में मैंने अपने पास कुछ न रखा. अब मेरे पास कुछ नहीं है. उस वक्त भी हमारे पास एक चीज़ होती है जिसे पश्चाताप कहा जाता है मगर असल में वह एक कड़ा अनुभव होता है.
इन दिनों जाने कहाँ से बहुत सारे काम उग आये हैं. दिन भर कोई न कोई काम लगा ही रहता है. दफ्तर के स्टूडियो को ठंडा रखने वाला प्लांट फेल हो रखा है मगर सबसे ज्यादा समय वहीँ बीत रहा है. लोग आते रहते हैं और रिकार्डिंग का सिलसिला बना रहता है. मुझे अचरज होता है कि कैसे एक के बाद एक काम लगातार आ रहे हैं. मेरी दिनचर्या कैसे इतनी व्यस्त हो गयी है. मैं जिस उदासी और अबखाई में पड़ा रहता था और उसे खुशी भरा समझता था उसके टूटते ही आसानी आने लगी.
रेडियो मन का ही काम है. बंद कमरे, सीला मौसम, आवाज़ सोखने वाली जगहों पर ध्वनि के विशेष प्रभाव और कोई मन रुचती रचना का निर्माण. ये मन का काम अचानक होने लगता है. इस तरह के बदलाव को पहचानने की कोशिश में पाता हूँ कि ये भी एक लापरवाही का विलोम है. इस तरह कि मन खुद की रिपेयरिंग करने में लगा रहता है. हम उसको लाख नुकसान पहुंचाएं वह अपनी आतंरिक रक्षा प्रणाली को कभी खत्म नहीं होने देता.
मैं जब अवचेतन दिनों में बचाई गयी चीज़ों को देखता हूँ तो मन में एक ख़याल आता है कि इनका हासिल क्या है? मैं ऐसा तो हूँ नहीं कि अपने जीवन के हिस्सों को कहानियां बना कर लिखूं फिर ये किस काम का.
कोई तो वजह है, लापरवाही के विलोम में घटित इस परवाह की... * * *

[Painting : The Angel Standing in the Sun by J. M. W. Turner.]
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Published on September 26, 2014 21:34
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Kishore Chaudhary
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