कहवा के प्याले की तलछट
के रंग की शाम पहाड़ पर उतरती हुई.
उपत्यका में प्रेमी युगल, पहाड़ को सर पर उठाये हुए. * * *
डूबती हुई रोशनी में,
बुझते हुये सायों के बीच थोर के कांटे
रेगिस्तानी सहोदर
केक्टस की आभा लिए हुए.
ज़िंदगी कितनी सुस्त.
* * *
कई बार इंतज़ार की तरह
खेजड़ी के पेड़ पर गिरती है बिजली याद की
और फिर अगले तीन मौसम देखना होता है सूना रेगिस्तान. * * *
रात बीत गयी ऐसी अनेक रातें बीत गयी।
बिस्तर पर नंगी पड़ी, तस्वीर का रंग उड़ता गया. * * *
Published on September 15, 2014 08:05