तीन रातें और चार दिन की ज़िंदगी

एक शहर में दो अजनबी लोगों की थोड़ी फ़्लैशबैक और अधिक वर्तमान में बीती तीन रातें और चार दिन की ज़िंदगी संपन्न हुई। कहानी में तनाव नहीं था। कहानी में प्रेम भी नहीं था। कहानी परिस्थितियों के अधीन जी रहे दो लोगों की दिनचर्या थी।

इस सबके बाद अंत में पाठक के लिए थोड़ी देर सोचने को एक चमत्कार का पाठ था। केसर, जो कि कथा की नायिका है। दूध जैसी बर्फ में घुलकर अदृश्य हो चुकी थी। कथा के आरम्भ में, होटल में काम करने वाली एक पात्र इस कथा में इस तरह छूट गई थी, जैसे कहानीकार अगली कथा उसी की कहेगा। वह पुनः किसी आवेग में लंदन से प्राग की फ्लाइट पकड़ेगा और अनकहे छूट गए इस पात्र के साथ कुछ रातें और दिन बिताएगा। एक नई कहानी कहेगा।कुछ प्रसिद्ध लेखकों की उक्तियों से आरंभ होने वाला हर नया पाठ एक सिलसिला है। जिसके उपशीर्षक इस कथा को औपन्यासिक रूप देते हैं। किंतु वस्तुतः ये एक कहानी ही है। उपन्यास नहीं है। हिंदी साहित्य जगत में पिछले दस एक वर्षों में उपन्यास कहकर लंबी कहानियाँ प्रस्तुत की गई हैं। आपने अगर सोशल मीडिया पर चर्चित सस्ते, हल्के और उबाऊ कथित प्रसिद्ध उपन्यास पढ़े हैं तो आपको याद आया होगा कि वे उपन्यास नहीं हैं। वह सब पुरानी कृतियों के मूल कथानक पर रचा गया, उबाऊ गद्य है। जिस में उधार ली गई या ये कहना ठीक होगा कि सीनाज़ोरी से चोरी की गई कथा पर रचा गया गद्य है। विश्वजीत रानाडे की कहानी प्राग एक साफ़ और सादा कथा है। ये उन कथित उपन्यासों से बेहतर है कि आप पढ़ते हुए अधिक ऊब महसूस नहीं करते हालाँकि कोई जिज्ञासा नहीं जागती कि आगे क्या होने वाला है। एक शहर में तीन दिन चार रात जी लेने जैसा अहसास आपको प्रसन्न करता है कि पढ़ने में आपने समय नष्ट नहीं किया है। जो हुआ अच्छा हुआ। मैंने ये किताब कल एक नौजवान मित्र को सौंप दी है। पता नहीं वह पढ़ पाएगा या नहीं। मैंने उनसे इतना अवश्य कहा है कि आजकल यही शिल्प और ऐसा ही कथानक पढ़ा जा रहा है। मुझे एक बात पर कई बार आश्चर्य होता है कि प्रकाशक कथाकारों को ये क्यों नहीं कहते कि जाइए, कहानी और उपन्यास का भेद पढ़कर आइए। पाठकों के लिए आश्चर्य नहीं है कि अच्छे पाठक प्रायः चुप रहते हैं। मतिहीन पाठक रील्स बनाते हैं और आपको बताते हैं कि कौनसी सात किताबें आपको अवश्य पढ़नी चाहिए। प्राग (उपन्यास) ख्याति प्रकाशन से छपा है। मेरी ये टिप्पणी इस कथा के लिए किसी भी प्रकार समीक्षा नहीं है। ये केवल एक पाठकीय लघु टिप्पणी है। मैं चुप न रहा इसलिए तय है कि मैं अच्छा पाठक नहीं हूँ।


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Published on April 01, 2026 02:23
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Kishore Chaudhary
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