जीवन अलग रूपों में

 कुल जमा चार फ़ोन कॉल से मालूम हुआ कि विचित्र मौसम है। कहीं छींटे गिर रहे और कहीं हवा तेज़ है। इधर सूनी दोपहर के बाद उतरी शांत शाम पसरी हुई है। इस शाम में अचानक लगता है कि मानू को यहाँ होना चाहिए था।

एक लंबे कहे जा सकने योग्य अवकाश से कार्यालय लौटने पर चार पुस्तकों का बंडल मिला। “ये कुछ दिन पहले आया था” ऐसा कहते हुए कार्यालय के सहयोगी के स्वर में थोड़ी उदासी थी। जैसे मेरे अवकाश पर होने के कारण समय पर पुस्तकें मुझ तक न पहुँच पाने में उनका कोई दोष है। मैंने कहा “ ये सुंदर बात है। इस बार लौटने पर खालीपन बहुत बड़ा है। ये पुस्तकें कुछ क्षण मेरा सहयोग करेंगीं।” हाथ जोड़कर उनका अभिवादन करते हुए बंडल ले लिया। पतझड़ कहीं आया होगा मगर मुझतक नहीं आया। मैं किसी स्वप्न में साधारण जीवन जिए जा रहा हूँ। कभी लगता है कि स्वप्न का न टूटना अच्छा है। कभी सोचता हूँ, चलो उदास आदमी, आगे चलो। इसलिए दोपहर में निर्जन हो चुकी सड़क पर विचारों में खोया हुआ घर पहुँच जाता हूँ। रेगिस्तान का सूनापन साथ चलता है और मैं शुक्रिया कहता जाता हूँ कि क्लस्ट्रोफ़ोबिया से मुक्ति केवल दुर्गम भूगोल ही दे सकता है। जैसे पहाड़, समंदर और रेगिस्तान। मैं अपने ख़ालीपन को शब्दों से भरने की जुगत में हूँ। कि लिखना आरम्भ करूँ तो अपनी कथा के पात्रों के दुख, अकेलेपन और असीम उदासी में रम सकूँ। मैं भूल जाऊँ कि दफ़्तर जाना होता है, रेडियो पर बोलना होता है और स्टूडियो में रिकॉर्डिंग्स करनी होती है। मैं केवल नशे में जीने की कामना को फलीभूत होते देख सकूँ। देखूँ भी नहीं बस ये गुज़र जाए और मुझे ख़बर न हो। एक चुटकी उदासी। ये शीर्षक मन को छू लेने के योग्य था। किसी नई किताब पर लिखा हो कि ये कहानी संग्रह है तो लाज़िम है कि मेरी अंगुलियाँ सबसे पहले उन्हीं पन्नों को टटोलने लगेंगीं। कहानियों से प्रेम आपको सुंदर प्रेमी बनाता है। वह जो बुलबुलों की तरह फूटता है। वह जिसमें सात रंग छिपे रहते हैं। वह जिसे ठहरे हुए पाठक उपेक्षा से देखते हैं। लेकिन वे नहीं जानते कि कहानियाँ प्रेमी के छोटे चुम्बनों की भाँति होती हैं। उम्र भर याद रह सकती हैं। मैंने एक कहानी पढ़ी। ग्यारहवाँ घंटा। ग्यारह की संरचना काफ़ी रोचक है। इस के रूप में अनेक अर्थ गढ़े जा सकते हैं। ये शुभ है। ये पूर्णता भी है। लेकिन इसके आगे का संसार जटिल होता है। जहाँ से एक असामाप्य उलझन और कार्य आरम्भ हो जाता है। कहानी अनुमिता शर्मा की कही हुई है। जब आप बहुत अकेले और अशांत होते हैं तब अचानक कोई चिड़िया चहचहाती है। कोई भ्रमर गुनगुनाता है। कभी कान बजने लगते हैं। ठीक ऐसे बेतरतीब उलझे हुए होने में किसी प्राचीन वस्तु तक पहुँचने की भाँति, इस कहानी तक पहुँचा। मैंने अनुमिता को पहली बार पढ़ा। एक कहानी भर पढ़ने से क्लारिस लिस्पेक्टर की स्मृति हो आई। बीसवीं सदी की कहानीकार हैं। उन्हें पढ़ते समय अक्सर लगता है कि कहानी बाहर नहीं घट रही, मन के भीतर घट रही है।वे कहानी नहीं सुनातीं — चेतना को पकड़ती हैं। पढ़ते समय लग सकता है कि घटना लगभग नहीं है। जबकि सबकुछ घटित होता है। घटना से जुड़ने के लिए पात्र के मन की सूक्ष्म हलचल की परछाई को पकड़ना होता है। समय की इतनी उलट देर होती है कि पाठक रेगिस्तान की शाम को देखते हुए अनेक रंगों से गुज़रता हुआ भूल जाता है कि कौनसा रंग कब देखा और स्थायी रंग क्या था। घटना को अनुभूति में बदल देना, क्लारिस लिस्पेक्टर का सिग्नेचर है। अनुमिता को पढ़ते हुए पाया कि घटनाएँ पिघल कर अनुभूतियों में ढल चुकी हैं। पिघले हुए मोम की संरचना एक ऐब्सट्रेक्ट आर्ट है। अनुमिता की कहानी ग्यारहवाँ घंटा इसी प्रकार का कोई जादू है। अस्तित्व का अनुभव। आह। ये सब लिखते समय कानों पर पास ही बजते शादी के गानों की जुएँ रेंग रही हैं। जल्द ये क़स्बा छोड़कर गाँव चला जाना चाहता हूँ। हालाँकि जानता हूँ वहाँ जीवन अलग रूपों में अधिक कठिन है। जैसे अनन्या बिल्ली को सौत समझती है।

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Published on February 19, 2026 05:52
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Kishore Chaudhary
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