खुलासे में नहीं आएंगे
मुख़्तसर वक़्त में यह बात नहीं हो सकतीदर्द इतने हैं खुलासे में नहीं आएंगे।
रेगिस्तान के जीवन की मान-मर्यादा, लज्जा और सुंदरता को सोशल साइट्स में कुरूप करना आरंभ कर दिया है। फटे-ओछे कपड़ों, भद्दी हरकतों, निर्लज स्त्री-पुरुष संवादों और बेहूदा लतीफों से वीडियो और रील बनाने वालों ने बेशर्मी का अफ़ीम चटा दिया है। इनके फॉलोवर्स अपने पुरखों की इज्ज़त पर कालिख पोत रहे हैं।
मैंने इस सब से उकता कर अपने इंस्टा अकाउंट को डीएक्टिवेट कर दिया है। वहां कुछ मित्र साहित्य और संस्कृति की बातें शेयर करते थे मगर इसके एवज में रील्स की गंदगी को सहन करना कठिन हो गया था।
ये कैसी छवि गढ़ी जा रही है। ये कैसा आनंद है। कुरूपता के क्या सुख हैं। निर्लजता कैसा परमानंद है। सहवास के संवादों में कैसा ज्ञान है। स्त्री पुरुष के सुंदर लौकिक संबंधों में घटिया चुटकलों की कैसी संस्कृति है। ये सब बाल मन को किधर ले जा रहे हैं। ये कैसी फीडिंग है। इस पर सबसे बड़ा सवाल है कि कथित शिक्षित और समझदार लोग क्या पीकर सो गए हैं। वे अपने बच्चों के इंस्टा अकाउंट्स को क्यों नज़रंदाज़ किए हुए हैं?
मैं इसी सोच से बाहर आता तब तक एक नया विषय सामने आ खड़ा हुआ है। बाड़मेर के ऑनलाइन सूचना संवादी।
चुनाव संपन्न हो चुके हैं लेकिन पत्रकारिता की औपचारिक पढ़ाई भी नहीं करने वाले नौसिखिए और नादान युवा विष की फसल बो रहे हैं। फॉलोवर्स और रीच के लालच में जातिवाद के ज़हर को बढ़ाते जा रहे हैं। भड़काऊ और आग लगाने वाली बातें इशारों इशारों में फैला रहे हैं। बाड़मेर में सोशल साइट्स यूजर अपनी नासमझी में इनके ज़हर के प्यालों को पिए जा रहे हैं।
पांच हज़ार साल पुराना जातियों का इतिहास है। इसे मिटाया नहीं जा सकता। इसका अपना सौंदर्य या उपयोगिता हो या न हो किंतु ये आपस में लड़ने के लिए नहीं बनी हैं। ये एक दूजे का साथ देने, प्रेम भरा जीवन जीने और समानता के भाव को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित की जा सकती हैं। लेकिन सबकुछ विपरीत हो रहा है।
ये बेहद दुख की बात है। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि लोग आग लगाते रहे और हम सब चुप देखते रहे तो इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।
इसलिए इन सजीव सूचना संवादियों के शुभचिंतकों से एक आग्रह है कि कृपया उनको अपनी सामाजिक जिम्मेदारी याद दिलाएं। उनसे कहें कि मानवता का पाठ कहीं से भी सीखा जा सकता है तो एक बार उसका अ आ सीख आएं।
बाड़मेर में कुछ बेहद अच्छे पत्रकार हैं। सम्माननीय पुरुस्कारों से पुरस्कृत हैं। उनकी रपट देश भर में पढ़ी गई हैं। उन्होंने समाचारों के मोल को सीखा है। रेगिस्तान के जीवन की विश्वसनीय रिपोर्टिंग की है। लेकिन वे सब प्रिंट माध्यम में काम कर रहे हैं। अपने निजी कारणों से सोशल साइट्स पर सक्रिय नहीं हैं। यानी गुणी और अनुभवी चुप हैं दूजे सब विषाक्त टर्राहट में लगे हैं।
इसे पढ़कर कोई नाराज़ हो जाएगा। तो हमको ऐसे लोगों को खुश रखने की कोई चाह नहीं है।
हमारी एक ही इच्छा है सब जातियों के युवा प्रसन्न रहें। अच्छी शिक्षा ग्रहण करें। देश विदेश में अपने ज्ञान से, तकनीक की समझ से भले काम करें और रेगिस्तान को सुंदर बना रहने दें। लेकिन क्या कीजे?
ख़त के छोटे से तराशे में नहीं आएंगे ग़म ज़ियादा हैं लिफ़ाफ़े में नहीं आएंगे खालिद नदीम शामी
धन्यवाद।
रेगिस्तान के जीवन की मान-मर्यादा, लज्जा और सुंदरता को सोशल साइट्स में कुरूप करना आरंभ कर दिया है। फटे-ओछे कपड़ों, भद्दी हरकतों, निर्लज स्त्री-पुरुष संवादों और बेहूदा लतीफों से वीडियो और रील बनाने वालों ने बेशर्मी का अफ़ीम चटा दिया है। इनके फॉलोवर्स अपने पुरखों की इज्ज़त पर कालिख पोत रहे हैं।
मैंने इस सब से उकता कर अपने इंस्टा अकाउंट को डीएक्टिवेट कर दिया है। वहां कुछ मित्र साहित्य और संस्कृति की बातें शेयर करते थे मगर इसके एवज में रील्स की गंदगी को सहन करना कठिन हो गया था।
ये कैसी छवि गढ़ी जा रही है। ये कैसा आनंद है। कुरूपता के क्या सुख हैं। निर्लजता कैसा परमानंद है। सहवास के संवादों में कैसा ज्ञान है। स्त्री पुरुष के सुंदर लौकिक संबंधों में घटिया चुटकलों की कैसी संस्कृति है। ये सब बाल मन को किधर ले जा रहे हैं। ये कैसी फीडिंग है। इस पर सबसे बड़ा सवाल है कि कथित शिक्षित और समझदार लोग क्या पीकर सो गए हैं। वे अपने बच्चों के इंस्टा अकाउंट्स को क्यों नज़रंदाज़ किए हुए हैं?
मैं इसी सोच से बाहर आता तब तक एक नया विषय सामने आ खड़ा हुआ है। बाड़मेर के ऑनलाइन सूचना संवादी।
चुनाव संपन्न हो चुके हैं लेकिन पत्रकारिता की औपचारिक पढ़ाई भी नहीं करने वाले नौसिखिए और नादान युवा विष की फसल बो रहे हैं। फॉलोवर्स और रीच के लालच में जातिवाद के ज़हर को बढ़ाते जा रहे हैं। भड़काऊ और आग लगाने वाली बातें इशारों इशारों में फैला रहे हैं। बाड़मेर में सोशल साइट्स यूजर अपनी नासमझी में इनके ज़हर के प्यालों को पिए जा रहे हैं।
पांच हज़ार साल पुराना जातियों का इतिहास है। इसे मिटाया नहीं जा सकता। इसका अपना सौंदर्य या उपयोगिता हो या न हो किंतु ये आपस में लड़ने के लिए नहीं बनी हैं। ये एक दूजे का साथ देने, प्रेम भरा जीवन जीने और समानता के भाव को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित की जा सकती हैं। लेकिन सबकुछ विपरीत हो रहा है।
ये बेहद दुख की बात है। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि लोग आग लगाते रहे और हम सब चुप देखते रहे तो इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।
इसलिए इन सजीव सूचना संवादियों के शुभचिंतकों से एक आग्रह है कि कृपया उनको अपनी सामाजिक जिम्मेदारी याद दिलाएं। उनसे कहें कि मानवता का पाठ कहीं से भी सीखा जा सकता है तो एक बार उसका अ आ सीख आएं।
बाड़मेर में कुछ बेहद अच्छे पत्रकार हैं। सम्माननीय पुरुस्कारों से पुरस्कृत हैं। उनकी रपट देश भर में पढ़ी गई हैं। उन्होंने समाचारों के मोल को सीखा है। रेगिस्तान के जीवन की विश्वसनीय रिपोर्टिंग की है। लेकिन वे सब प्रिंट माध्यम में काम कर रहे हैं। अपने निजी कारणों से सोशल साइट्स पर सक्रिय नहीं हैं। यानी गुणी और अनुभवी चुप हैं दूजे सब विषाक्त टर्राहट में लगे हैं।
इसे पढ़कर कोई नाराज़ हो जाएगा। तो हमको ऐसे लोगों को खुश रखने की कोई चाह नहीं है।
हमारी एक ही इच्छा है सब जातियों के युवा प्रसन्न रहें। अच्छी शिक्षा ग्रहण करें। देश विदेश में अपने ज्ञान से, तकनीक की समझ से भले काम करें और रेगिस्तान को सुंदर बना रहने दें। लेकिन क्या कीजे?
ख़त के छोटे से तराशे में नहीं आएंगे ग़म ज़ियादा हैं लिफ़ाफ़े में नहीं आएंगे खालिद नदीम शामी
धन्यवाद।
Published on May 01, 2024 03:50
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