पोटाश बम
उसकी निकर की जेब में कुछ रखा था. "कंचे है?" ऐसा पूछते ही बोला- "नहीं. उधर चलते हैं."
दोनों लुढ़कती सायकिल पर इस तरह सवार हुए जैसे कड़ी में पाँव फंसाकर घोड़े की जीन पर बैठ रहे हो. ढलान में सायकिल घने बबूलों के पार आबादी से दूर तक जाती थी. सीढियों से घिरे मैदान में पसरी हुई धूप में कोई परिंदा भी नहीं दिखता था.
दोनों वहां आकर सीमेंट के चबूतरे जैसे मंच के पास खड़े हो गए. उसने अपनी जेब से दो छोटी गोलियां निकाली. एक को हाथ से थोड़ा सा सहलाया और फिर ज़मीन पर मारा. छोटा धमाका हुआ लेकिन खाली मैदान में उसकी आवाज़ गूंजने लगी. परिंदे जाने कहाँ छिपे बैठे थे कि अचानक रेत के मैदान पर छायाएं तैरने लगीं. आकाश में बहुत सारे परिंदे उड़ रहे थे.
उसने कहा- "तुम फोड़ो"
कपड़े की बेहद छोटी कंचे जितनी गेंद में कुछ बंधा हुआ था. उसे सीमेंट के फर्श पर पटका तो फिर वही धमाका हुआ.
"ये तुमने बनाया है?""हाँ""कैसे?""पोटाश से" "वो क्या होता है?""बारूद" "बारूद तो बहुत बड़ी चीज़ होनी चाहिए जो सब कुछ उड़ा देती है. मैंने पढ़ा है कि उससे पहाड़ के पहाड़ उड़ जाते हैं.""हाँ. ये छोटा बारूद है."
दो-चार-दस बार पटाखे की तरह आवाजें सुनी. परिंदे कहीं चले गए थे या वे दो तीन बार उड़ कर कहीं बैठ गए होंगे कि कुछ होने वाला नहीं है. हम दोनों बैठ गए. धूप की चादर में तल्खी कम होने लगी. दूर तक सूना मैदान था. बबूल की सूखी झाड़ियों में कोई हलचल नहीं थी. सीढियाँ तप रही थी. कोई कागज़ हवा के साथ उड़ता तो हम उधर देखते. ऐसे ही बहुत देर बैठे रहे. थकान नहीं थी फिर भी हम सीढियों पर कुछ चक्कर लगा कर लेट गए. रेगिस्तान की भरी गरम दोपहर में छाँव में बनी सीमेंट की सीढियाँ ठंडी थी. दुनिया बहुत पीछे छूट गयी थी.
"ये आवाज़ कहाँ चली जाती है?"
"कौनसी आवाज़?" उसने देखे बिना ही पूछा.
"जो टिकड़ी फोड़ने से आती है"
"वहीं जहाँ काका चले गये."
वो अपने पिता के बारे में बता रहा था. उसके पिता घर में छोटे थे. इसलिए बड़े पापा के बच्चे उनको काका कहते थे. वह भी उनको काका कहने लगा था. एक दोपहर रेगिस्तान में बारिश होने लगी. चार बजे तक बाज़ार में पानी भर गया. पानी जितना निकलता था उससे दुगना आ जाता. काका ने दुकान का शटर नीचे किया. ताला लगाया. सड़क के बीच पैर रखा ही था कि पानी के बहाव ने झोल दिया. वे पास खड़े बिजली के खम्भे से टकराए. बिजली के खम्भे ने उनको गिरने नहीं दिया. लोग देखते रहे. किसी की हिम्मत न हुई कि उन तक जाये. आखिर लाईट कट गयी. फिर उसके काका को एक ठेले पर घर लाया गया.
आसमान में एक चील दिखी. बिना आवाज़ किये पंख हिलाए बिना उडती हुई. गोल चक्कर को धीरे धीरे कम कर रही थी. जैसे किसी कुएं में कोई दीवार के सहारे बनी सीढियों पर उतर रहा हो. वह हमारे सर के ठीक ऊपर आ गयी.
उसने जेब को टटोला. धीरे से खड़ा हुआ दो बम एक साथ मुट्ठी में भरकर ज़मीन पर पटके. धमाका हुआ. रेत उड़ी चील ने ऊंचाई की ओर पंख कर लिए. जब चील को इससे कुछ न हुआ तो हम दोनों ने एक दूजे के मुंह देखे. हम बैठ गए थे.
उसने कहा- "एक दिन किसी को कुछ नहीं होता""कुछ नहीं होता मतलब?""जैसे वे परिंदे पहले धमाके से डरकर उड़ गए थे न. बाद के धमाकों से उनको उनको कुछ नहीं हुआ.""तुझे कैसे पता कि कुछ नहीं हुआ, वे डर कर दूर उड़ गए हैं"उसने कहा- "जब काका को घर लाये थे तब माँ उनको देखकर गिर गयी थी. जैसे कोई बहुत बड़ा धमाका हुआ. उसके बाद माँ कई महीनों तक धमाके से डरी रही."
वह चुप हो गया था.
खाली मैदान में उड़ रही धूल शांत हो गयी थी. सीढियों पर बने टीन के शेड पर कबूतरों के पाँव बजने लगे थे. कबूतरों के पांवों की आवाज़ जिधर जाती, हमारा मन उधर ही जाता. जैसे हम टीन की शेड के उपर चलते हुए कबूतरों का पीछा कर रहे थे.
"देखो कबूतर लौट आये हैं."इस बार उसने अपनी जेब पर हाथ नहीं फेरा. उसके पास पोटाश के बम बचे हुए थे लेकिन उसमें कोई उत्सुकता न थी. "तुमको ये बम बनाना किसने सिखाया?""काका के जाने के बाद दिवाली आई तब दादा ने कहा इस बार घर में दिए नहीं जलेंगे. फिर मालूम हुआ पटाखे भी नहीं आयेंगे. कारखाने में बैठा हुआ मैं रोने लगा. दादा चुप बैठे रहे. उनके एक पुराने दोस्त हैं. वे वहीँ काम करते थे. वे मेरी अंगुली पकड़ कर ले गए. उन्होंने मुझे कुछ कपड़े वाले बम बनाकर दिए थे""तुम को उन्होंने सिखाया?""ना. कोई नहीं सिखाता. ख़ुद सीखना पड़ता है. मैंने चुपके से उनको बनाते हुए देखा था. फिर अगली दिवाली जब सब फटाखे फोड़ रहे थे तब भी मैंने यही बम बनाये."
उसकी आँखों में मुस्कान थी.
उसने मुझे घूरती हुई हंसी को दबाये हुए देखा. "पता है एक बार चार बम मैंने स्कूल में भी फोड़े थे."
एक गिरगिट गरम रेत पर पाँव उठाये भागता हुआ हमारी तरफ आ रहा था. वह बहुत नज़दीक का शिकार हो सकता था. मैंने उसका हाथ पकड़ा. वह हरकत में आया. उसने जेब से एक बम निकाला. गिरगिट ने जैसे हमको देखा ही नहीं हो. वह चार कदम दूर था तभी धमाका हुआ. हल्का धुआँ उड़ गया. गिरगिट उल्टा पड़ा हुआ था. उसका चांदी जैसा पेट चमक रहा था. हम दोनों के चेहरे पर जो प्रसन्नता थी वह उतरने लगी. अपलक उस गिरगिट को देखते हुए दुःख होने लगा. हम दोनों के हाथ आपस में बंधे हुए थे. हथेलियाँ पसीने से भरने लगी थी.
अचानक गिरगिट ने पलटी खाई और वह तेज़ी से दौड़ता हुआ सीढियाँ चढने लगा.
हमने एक बार एक दूजे की हथेली पर दबाव महसूस किया और फिर हाथ छोड़ दिए. ठंडी हवा चलने लगी.
"क्या इसी तरह धमाके से डरकर गिरी तुम्हारी माँ भी उठ खड़ी हुई थी?""नहीं"
वह कुछ सोचने लगा. उसे सोचते हुए देखा नहीं जा रहा था इसलिए दूर देखने लगा. बबूलों के बीच से एक खरगोश दौड़ा और कहीं खो गया. मेरे कंधे पर उसका हाथ था. हम सीढियाँ उतर रहे थे. वह दोनों पांव एक साथ करके कूदा. इस तरह हम सब सीढियों पर कूदते हुए उतरे. रेत पर चलते हुए सफेदे के पेड़ों की हल्की छाँव की ओर चले गए. वहां एक नल लगा था. हमने उसे खोला तो गरम उबलता हुआ पानी आया. हाथ झटके से पीछे किया था. उसी हाथ को डरते हुए आगे बढाया. ठंडा पानी आने लगा था.
बूक से पानी पीने के बाद उसको कहा- "पता है इसको ओक कहते हैं" "ओक ओक ओक हा हा हा..." हम हँसते हुए सायकिलों की ओर दौड़ रहे थे. अचानक रुक जाने पर वह बोला- "क्या हुआ?"
"पापा..."
दूर एक लम्बा आदमी हमारे आगे चला जा रहा था. उसने मेरा हाथ थामा और रुकने को कहा. "तेरे पापा नहीं है, कोई और है"
उसने अपने कलाई को मुंह पर रखा और ज़ोर से बुलकारा भरा. ब ब ब बो ह ह... ये मुकाबला जीत लिए जाने का बाद का ऐलान था. उसने तुरंत सायकिल के पैडल पर जोर से पाँव मारा. उसके पीछे मैं भी घोड़े पर सवार हो गया.
उसने सायकिल के पास आते ही कहा- "काका होने चाहिए भले ही पीटते हो"
उसकी सायकिल पर पैडल सुस्त थे. चढ़ाई ज़्यादा थी. पहले उसका घर आता फिर मेरा. हम पास पहुंचे तब उसने कहा- "बाद में माँ कभी नहीं डरी. जैसे पहले धमाके के बाद परिंदे नहीं डरे थे."* * *
कहानी का पहला टुकड़ा. शीर्षक है पोटाश बम. ज़िन्दगी को फोड़ खुरच कर देखा तो इससे ज़्यादा कुछ न निकला. अधिकतर प्रेम भी पोटाश बम थे.* * *
[Pic credit - craftdaddyblog]
दोनों लुढ़कती सायकिल पर इस तरह सवार हुए जैसे कड़ी में पाँव फंसाकर घोड़े की जीन पर बैठ रहे हो. ढलान में सायकिल घने बबूलों के पार आबादी से दूर तक जाती थी. सीढियों से घिरे मैदान में पसरी हुई धूप में कोई परिंदा भी नहीं दिखता था.
दोनों वहां आकर सीमेंट के चबूतरे जैसे मंच के पास खड़े हो गए. उसने अपनी जेब से दो छोटी गोलियां निकाली. एक को हाथ से थोड़ा सा सहलाया और फिर ज़मीन पर मारा. छोटा धमाका हुआ लेकिन खाली मैदान में उसकी आवाज़ गूंजने लगी. परिंदे जाने कहाँ छिपे बैठे थे कि अचानक रेत के मैदान पर छायाएं तैरने लगीं. आकाश में बहुत सारे परिंदे उड़ रहे थे.
उसने कहा- "तुम फोड़ो"
कपड़े की बेहद छोटी कंचे जितनी गेंद में कुछ बंधा हुआ था. उसे सीमेंट के फर्श पर पटका तो फिर वही धमाका हुआ.
"ये तुमने बनाया है?""हाँ""कैसे?""पोटाश से" "वो क्या होता है?""बारूद" "बारूद तो बहुत बड़ी चीज़ होनी चाहिए जो सब कुछ उड़ा देती है. मैंने पढ़ा है कि उससे पहाड़ के पहाड़ उड़ जाते हैं.""हाँ. ये छोटा बारूद है."
दो-चार-दस बार पटाखे की तरह आवाजें सुनी. परिंदे कहीं चले गए थे या वे दो तीन बार उड़ कर कहीं बैठ गए होंगे कि कुछ होने वाला नहीं है. हम दोनों बैठ गए. धूप की चादर में तल्खी कम होने लगी. दूर तक सूना मैदान था. बबूल की सूखी झाड़ियों में कोई हलचल नहीं थी. सीढियाँ तप रही थी. कोई कागज़ हवा के साथ उड़ता तो हम उधर देखते. ऐसे ही बहुत देर बैठे रहे. थकान नहीं थी फिर भी हम सीढियों पर कुछ चक्कर लगा कर लेट गए. रेगिस्तान की भरी गरम दोपहर में छाँव में बनी सीमेंट की सीढियाँ ठंडी थी. दुनिया बहुत पीछे छूट गयी थी.
"ये आवाज़ कहाँ चली जाती है?"
"कौनसी आवाज़?" उसने देखे बिना ही पूछा.
"जो टिकड़ी फोड़ने से आती है"
"वहीं जहाँ काका चले गये."
वो अपने पिता के बारे में बता रहा था. उसके पिता घर में छोटे थे. इसलिए बड़े पापा के बच्चे उनको काका कहते थे. वह भी उनको काका कहने लगा था. एक दोपहर रेगिस्तान में बारिश होने लगी. चार बजे तक बाज़ार में पानी भर गया. पानी जितना निकलता था उससे दुगना आ जाता. काका ने दुकान का शटर नीचे किया. ताला लगाया. सड़क के बीच पैर रखा ही था कि पानी के बहाव ने झोल दिया. वे पास खड़े बिजली के खम्भे से टकराए. बिजली के खम्भे ने उनको गिरने नहीं दिया. लोग देखते रहे. किसी की हिम्मत न हुई कि उन तक जाये. आखिर लाईट कट गयी. फिर उसके काका को एक ठेले पर घर लाया गया.आसमान में एक चील दिखी. बिना आवाज़ किये पंख हिलाए बिना उडती हुई. गोल चक्कर को धीरे धीरे कम कर रही थी. जैसे किसी कुएं में कोई दीवार के सहारे बनी सीढियों पर उतर रहा हो. वह हमारे सर के ठीक ऊपर आ गयी.
उसने जेब को टटोला. धीरे से खड़ा हुआ दो बम एक साथ मुट्ठी में भरकर ज़मीन पर पटके. धमाका हुआ. रेत उड़ी चील ने ऊंचाई की ओर पंख कर लिए. जब चील को इससे कुछ न हुआ तो हम दोनों ने एक दूजे के मुंह देखे. हम बैठ गए थे.
उसने कहा- "एक दिन किसी को कुछ नहीं होता""कुछ नहीं होता मतलब?""जैसे वे परिंदे पहले धमाके से डरकर उड़ गए थे न. बाद के धमाकों से उनको उनको कुछ नहीं हुआ.""तुझे कैसे पता कि कुछ नहीं हुआ, वे डर कर दूर उड़ गए हैं"उसने कहा- "जब काका को घर लाये थे तब माँ उनको देखकर गिर गयी थी. जैसे कोई बहुत बड़ा धमाका हुआ. उसके बाद माँ कई महीनों तक धमाके से डरी रही."
वह चुप हो गया था.
खाली मैदान में उड़ रही धूल शांत हो गयी थी. सीढियों पर बने टीन के शेड पर कबूतरों के पाँव बजने लगे थे. कबूतरों के पांवों की आवाज़ जिधर जाती, हमारा मन उधर ही जाता. जैसे हम टीन की शेड के उपर चलते हुए कबूतरों का पीछा कर रहे थे.
"देखो कबूतर लौट आये हैं."इस बार उसने अपनी जेब पर हाथ नहीं फेरा. उसके पास पोटाश के बम बचे हुए थे लेकिन उसमें कोई उत्सुकता न थी. "तुमको ये बम बनाना किसने सिखाया?""काका के जाने के बाद दिवाली आई तब दादा ने कहा इस बार घर में दिए नहीं जलेंगे. फिर मालूम हुआ पटाखे भी नहीं आयेंगे. कारखाने में बैठा हुआ मैं रोने लगा. दादा चुप बैठे रहे. उनके एक पुराने दोस्त हैं. वे वहीँ काम करते थे. वे मेरी अंगुली पकड़ कर ले गए. उन्होंने मुझे कुछ कपड़े वाले बम बनाकर दिए थे""तुम को उन्होंने सिखाया?""ना. कोई नहीं सिखाता. ख़ुद सीखना पड़ता है. मैंने चुपके से उनको बनाते हुए देखा था. फिर अगली दिवाली जब सब फटाखे फोड़ रहे थे तब भी मैंने यही बम बनाये."
उसकी आँखों में मुस्कान थी.
उसने मुझे घूरती हुई हंसी को दबाये हुए देखा. "पता है एक बार चार बम मैंने स्कूल में भी फोड़े थे."
एक गिरगिट गरम रेत पर पाँव उठाये भागता हुआ हमारी तरफ आ रहा था. वह बहुत नज़दीक का शिकार हो सकता था. मैंने उसका हाथ पकड़ा. वह हरकत में आया. उसने जेब से एक बम निकाला. गिरगिट ने जैसे हमको देखा ही नहीं हो. वह चार कदम दूर था तभी धमाका हुआ. हल्का धुआँ उड़ गया. गिरगिट उल्टा पड़ा हुआ था. उसका चांदी जैसा पेट चमक रहा था. हम दोनों के चेहरे पर जो प्रसन्नता थी वह उतरने लगी. अपलक उस गिरगिट को देखते हुए दुःख होने लगा. हम दोनों के हाथ आपस में बंधे हुए थे. हथेलियाँ पसीने से भरने लगी थी.
अचानक गिरगिट ने पलटी खाई और वह तेज़ी से दौड़ता हुआ सीढियाँ चढने लगा.
हमने एक बार एक दूजे की हथेली पर दबाव महसूस किया और फिर हाथ छोड़ दिए. ठंडी हवा चलने लगी.
"क्या इसी तरह धमाके से डरकर गिरी तुम्हारी माँ भी उठ खड़ी हुई थी?""नहीं"
वह कुछ सोचने लगा. उसे सोचते हुए देखा नहीं जा रहा था इसलिए दूर देखने लगा. बबूलों के बीच से एक खरगोश दौड़ा और कहीं खो गया. मेरे कंधे पर उसका हाथ था. हम सीढियाँ उतर रहे थे. वह दोनों पांव एक साथ करके कूदा. इस तरह हम सब सीढियों पर कूदते हुए उतरे. रेत पर चलते हुए सफेदे के पेड़ों की हल्की छाँव की ओर चले गए. वहां एक नल लगा था. हमने उसे खोला तो गरम उबलता हुआ पानी आया. हाथ झटके से पीछे किया था. उसी हाथ को डरते हुए आगे बढाया. ठंडा पानी आने लगा था.
बूक से पानी पीने के बाद उसको कहा- "पता है इसको ओक कहते हैं" "ओक ओक ओक हा हा हा..." हम हँसते हुए सायकिलों की ओर दौड़ रहे थे. अचानक रुक जाने पर वह बोला- "क्या हुआ?"
"पापा..."
दूर एक लम्बा आदमी हमारे आगे चला जा रहा था. उसने मेरा हाथ थामा और रुकने को कहा. "तेरे पापा नहीं है, कोई और है"
उसने अपने कलाई को मुंह पर रखा और ज़ोर से बुलकारा भरा. ब ब ब बो ह ह... ये मुकाबला जीत लिए जाने का बाद का ऐलान था. उसने तुरंत सायकिल के पैडल पर जोर से पाँव मारा. उसके पीछे मैं भी घोड़े पर सवार हो गया.
उसने सायकिल के पास आते ही कहा- "काका होने चाहिए भले ही पीटते हो"
उसकी सायकिल पर पैडल सुस्त थे. चढ़ाई ज़्यादा थी. पहले उसका घर आता फिर मेरा. हम पास पहुंचे तब उसने कहा- "बाद में माँ कभी नहीं डरी. जैसे पहले धमाके के बाद परिंदे नहीं डरे थे."* * *
कहानी का पहला टुकड़ा. शीर्षक है पोटाश बम. ज़िन्दगी को फोड़ खुरच कर देखा तो इससे ज़्यादा कुछ न निकला. अधिकतर प्रेम भी पोटाश बम थे.* * *
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Published on April 22, 2018 02:05
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