उसकी आँखें, रेत में हुकिए का बनाया कुआं थी. मैं किसी चींटी की तरह उसे खोजता रहता था. प्रेम पूर्वक उस भुरभरी रेत पर फिसल जाना चाहता था. उसके दांतों से मुक्ति मेरी एक कामना थी.
उसके होंठ बंद रहते थे, मैं देर तक चुप उनको देखता था. कि हंसी की उफनती लहर आएगी और मैं एक पतली नौका की तरह उसमें खो जाऊँगा. मगर जिस रोज़ मैंने जाना कि वह किसी के प्रेम है. उसी रोज़ मैं रेगिस्तान की रेत के नीचे छुप गया.
यहाँ रेत के नीचे सीलन है, अँधेरा है पर यहाँ भी कभी-कभी उसकी आँखें याद आती हैं, यहाँ भी उसके बंद होठ दीखते हैं.
इसके आगे मैं नहीं सोचता हूँ. क्या होगा सोचकर...
[हुकिया समझते हैं? आंटलायन]
Published on October 28, 2017 03:30