एक स्थगित क्षण
वो जो अनजाने दफअतन हमारे जीवन में घट जाता है. वह जिसके पहले कुछ सोचा न था. वह जिसके बाद का सोचना अभी बाकी हो.उसका मन गुंजलक था.
वह दरवाज़ा खोलकर सीढियाँ नहीं उतरी. उसे इस बात का सब्र नहीं था कि मुख्य दरवाज़े के सामने बनी दुछ्ती से बाएं मुड़े और फिर रेलिया कि हेजिंग के पास से होती हुई चले. वह सदाबहार के फूलों के बराबर बने कच्चे रास्ते से जाये. उसे याद था कि रास्ता गीला है. पिछवाड़े में बने छोटे से कृत्रिम तालाब से बहकर पानी, काली मिट्टी के छोटे ढेर तक जा रहा था. वहीँ खरपतवार के बीच कुछ बैंगनी रंग के जंगली फूल उगे हुए थे.
वह खिड़की से कूद गयी.
चार हाथ ऊँची खिड़की में ग्रिल नहीं थी. बस दो पल्ले भर थे. पिछले कुछ दिनों से वह इस खिड़की में घंटो पालथी मार कर बैठी रहा करती थी. वह वहीँ से कूदी. बे आवाज़ चलते हुए छोटे तालाब तक आई और गीली मिट्टी से सने पैरों को पानी में डालकर बैठ गयी. मुड़कर देखे बिना आहटों की टोह लेती रही. क्या कोई इस तरफ आ रहा है. क्या आस-पास कोई आवाज़ है. क्या किसी ने देखा है?
उसने धप से अपनी दोनों आँखें ढक लीं. एक लम्हा सामने खड़ा हुआ था. जैसे कोई मुकदमे का पहला पन्ना. अकेला, कमजोर, हवा के साथ हिलता हुआ मगर खौफ से भरा हुआ. बंद आँखों तक कोई आहट नहीं आई. कोई आवाज़ भी नहीं. उसने आहिस्ता से अपने हाथ हटाये. नन्हे छोटे तालाब में स्थिर पड़े हुए पाँव थोड़े बेढब दिख रह थे. ज़रा सी हलचल से पानी हिलने लगता तो पांवों की शक्ल बदलने लगती. जैसे मोम के बने हुए पाँव हैं. पानी ज्यादा हिलता तो लगता कि पाँव मोम के नहीं कपडे के बने हुए हैं. वे पानी के साथ लहरा रहे हैं.
एक सिहरन हुई. उसे माँ की आवाज़ सुनाई दी- “कलमुही इस तरह खाली बरामदों में बिल्ली की तरह अकेली कहाँ फिर रही है. सत्यानाश होगा.” उसने अपनी पीठ पर झर रही झुरझुरी को महसूस किया. जैसे कई सारे आवाज़ के फाहे पीठ पर आ गिरे थे. वे फाहे बूँदें बनकर पीठ से फिसल रहे थे.
माँ नहीं है यहा पर. वह बहुत बरस दूर छूट गयी. बीस-इक्कीस की उम्र के आस-पास माँ की आँखों से चौकसी जाती रही. तन्हाई में बैठे रहने और अकेले घर के सूने कोनों में घूमने पर उठने वाले तानों-सलाहों-चेतावनियों के चक्रवात थम गए. माँ बराबर बैठ कर ऐसे देखने-सुनने लगी जैसे रिश्ता उलट गया हो. माँ उसकी बेटी हो गयी थी और वह माँ. फिर माँ उसकी तरफ इस उम्मीद से देखती थी जैसे वह सलीके से कोई कायदे की बात कहने वाली है.
आज सुबह, उस वक़्त शायद पौने चार बजे थे. ये सोचकर उसे अच्छा लगा. अगर तीन बजे के आसपास का समय होता तो बुरा लगता. चार बजे किसी का जागना उतना बुरा नहीं है. चार बजे अँधेरा उतना ही था, जितना रात बारह बजे रहा होगा. मगर मन ने भोर की आस बाँध ली थी तो वही स्याही ज़रा कम गहरी लगने लगी थी. इसी सोच में जैसे ही उसे ख़याल आया कि रात ढाई बजे उसने अपने कमरे की कुण्डी खोल दी थी.
भीतर से बंद दरवाज़ा उढ़का हुआ भर था.
हलकी चादर ओढ़े, सीधे लेटे हुए शरीर में एक ही जगह बची थी, जो ज़िन्दा थी. उसका दिल. वह रह-रह कर इस तरह धड़क रहा था कि जैसे अभी सारे संतुलन बिगड़ जायेंगे, एक तूफ़ान सा उठेगा और सबकुछ ढह जायेगा. वह ऐसे बहुत देर तक न सो पाई थी. उसका दिल ही उसको डरा रहा था. बेकाबू धड़कन से अधिक भयभीत करने वाली कोई चीज़ उसे याद नहीं आ रही थी. वह अपने बिस्तर से उठी. उसे लगा कि ऐसे उठना अच्छा नहीं है. उसे बिना कोई हरकत किये चुप लेटे रहना चाहिये. फिर भी वह आहिस्ता से दरवाज़े के पास दीवार का सहारा लेकर खड़ी हो गयी थी. दिल पर हाथ रखने से धड़कन काबू में नहीं आनी थी. उसे इस बात का यकीन था इसलिए उसने अपनी पीठ को पूरी तरह दीवार से सटा लिया. अगर संभव होता तो वह दीवार के भीतर प्रवेश कर जाती.
दरवाज़े के कब्जों से चरमराने की हलकी सी आवाज़ आई. उसकी आँखे अँधेरे में किसी चौंक से भर कर खुली रह गयी.
दरवाज़े से होकर भीतर आती बेहद हलकी सी पांवों को चाप. कालीन के मुलायम रेशों से रगड़ खाते हुए पाँव. एक. दो. तीन. उसी पलंग की ओर मुंह किये खड़ा हुआ एक साया. चुप. जैसे इंतजार में हो कि बिस्तर से कोई आवाज़ आएगी. एक लरज़िश से भरा हाथ चादर से बाहर आएगा. रेगिस्तान के सूने मार्ग पर दूर किसी साए के बुलावे की तरह बुलाएगा. मेरा करीब आओ. इस अँधेरे में ये सब कुछ न दिखेगा मगर दिखेगा. शरीर का हर अंग देखने सुनने लगेगा. बिना किसी छुअन और बिना किसी भाषा के हर तरह के संबोधन, उत्तर और प्रतिउत्तर में बीतता हुआ, सुबह का ठहरा वक़्त.
“रेहा...”
दीवार का सहारा कमजोर हो गया. एक आवाज़ जो सरगोशी थी. एक आवाज़, जो उस खाली पड़े बिस्तर को संबोधित थी. एक आवाज़, जिसने उसके दिल की बेकाबू धड़कनों को रोक दिया. सबकुछ ठहर गया. उत्तेजना, मद, सिहरन, भय, इंतज़ार सबकुछ ठहर गया.
एक स्थगित जीवन का क्षण जहाँ भूत और भविष्य अलोप हो चुके हों.
[दो प्याले स्ट्रोबेरी फ्लेवर वाली आइसक्रीम - एक]
Image courtesy : Rudolf Rinner
Published on March 27, 2016 23:38
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