चन्द्रनाथ - बैरागो Quotes
चन्द्रनाथ - बैरागो
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Sarat Chandra Chattopadhyay42 ratings, 4.36 average rating, 1 review
चन्द्रनाथ - बैरागो Quotes
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“जले हुए घर की जली दिवाल की तरह विक्षिप्त होकर”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
“रुपया-पैसा कमाना और उन्नति करना दोनों एक नहीं हैं,”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
“क्या तुम सचमुच ही अपने उज्ज्वल भविष्य को तिलांजलि देकर अपना सारा जीवन इस पाठशाला में ही गुजार दोगे?’ ‘आखिर, ब्राह्मण-कार्य तो विद्यादान ही है, कहीं बैठकर करे।”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
“दुःख चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे बरदाश्त करने में ही मनुष्यत्व है। ईश्वर यह कभी नहीं चाहता कि मनुष्य अक्षय होकर संसार छोड़ दे।”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
“पाठशाला का एक भी छात्र सचमुच आदमी बन जाए तो वह अकेला ही इन तीस करोड़ आदमियों का उद्धार कर सकता है।”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
“अपना कर्तव्य करने से पहले दूसरों के कर्तव्यों की आलोचना करना पाप है।”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
“किसी भी दशा में घबराकर गुस्सा होना या बिगड़ना वे लज्जाजनक और अत्यंत घृणास्पद समझते हैं। ऐसा आदमी चाहे कितना नाराज क्यों न हो, परंतु अपने आपको सँभाल सकता है।”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
“मन और मोती एक ही तरह का होता है, बेटा। पैर”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
“मैं कोई जानवर हूँ कि अकल की अपेक्षा गुस्सा कहीं अधिक है।”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
“क्रोध, अभिमान, लज्जा और अवश्यंभावी अपमान की आशंका से उसकी आँखों में आँसू भर आए।”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
“दुनिया में प्रायः ही देखा जाता है—किसी सामान्य कारण से ही गुरुतर अनिष्ट की उत्पत्ति होती है। शूर्पणखा का किंचित् चित्तचांचल्य ही सोने की लंका ध्वंस होने का हेतु बना। छोटी सी रूप-लालसा के लिए ट्रॉय नगर ध्वस्त हो गया। महानुभाव, राजा हरिश्चंद्र सामान्य कारण से ही ऐसे विपत्ति ग्रस्त हुए कि संसार में वैसा दृष्टांत दूसरा नहीं”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
“वह मछली जो भाग गई”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
“फल को ग्रहण करना जैसे मनुष्य का स्वभाव सिद्ध भाव है। जो मछली भाग जाती है, क्या वही बड़ी होती है?”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
“मनुष्य जिसे पा नहीं सकता, वही वस्तु उसकी अत्यंत प्रिय सामग्री होकर खड़ी रहती है। मनुष्य का चरित्र ऐसा ही है। तुम अशांति में हो, शांति ढूँढ़ने को घूम रहे हो—मैं शांति भोग रहा हूँ तो भी कहीं से जैसे अशांति को खींच लाया करता हूँ।”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
“सूर्यलोक की तरह परिष्कृत और स्फटिक की तरह स्वच्छ वस्तु लोकग्राह्य नहीं हुई—क्यों यह सहज-प्रांजल भाषा संसार के लोग नहीं समझ पाते?”
― चन्द्रनाथ - बैरागो
― चन्द्रनाथ - बैरागो
