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Nirmal Verma
“सत्तर बरस के ढाँचे में कितना कुछ सूख गया है, बदल गया है, बह गया है…यह मैं आपको बता सकता हूँ? शायद बता सकता, यदि उन्हें कोई बीमारी होती, कोई बुखार, किसी तरह का दुख-दर्द, कोई टीस, कोई ट्‌यूमर…तब उनमें से किसी को पकड़कर उनके भीतर झाँक सकता था…कौन-सी जगह है, जहाँ रोड़ा अटक गया है, कैसे उसे निकाला जा सकता है…लेकिन अगर ऐसा कुछ न हो, सबकुछ शान्त और समतल हो…तब कोई दरवाज़ा नहीं, जिसे खोलकर आप उनके भीतर प्रवेश कर सकें…क्या आप सोचते हैं कि एक्स-रे की तसवीरें देह के भेदों को भेद सकती हैं? नहीं जी, यह सबसे बड़ा इल्यूज़न है…आपको लगता है, सबकुछ नॉर्मल है, और यह सबसे बड़ी छलना है…क्योंकि सच बात यह है…कि नॉर्मल कुछ भी नहीं होता…पैदा होने के बाद के क्षण से ही मनुष्य उस अवस्था से दूर होता जाता है, जिसे हम ‘नॉर्मल’ कहते हैं…नॉर्मल होना देह की आकांक्षा है, असलियत नहीं। देह का अन्तिम सन्देश सिर्फ़ मृत्यु के सामने खुलता है, जिसे वह बिल्ली की तरह जबड़ों में दबाकर शून्य में अन्तर्ध्यान हो जाती है…जैसे एलिस के सामने चैशायर बिल्ली ग़ायब हो जाती थी—सिर्फ़ उसकी मुस्कराहट दिखाई देती रहती है…”
Nirmal Verma, अन्तिम अरण्य

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