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गुलज़ार
“आसान नहीं था इस तरह अपनी जड़ें छोड़ कर चल देना। और उस पर ये भी पता नहीं था। कहाँ और कैसे बीजे जायेंगे। बीजे जायेंगे भी या नहीं। पेड़ से टूटी शाख़ों को अक्सर देखा था, धूप में सूखते, टूटते और फिर गर्द में रुल जाते ! !”
Gulzar, दो लोग [Do Log]

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