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“राह में पड़े भिखारी की ओर पचास पैसे का सिक्का फेंकते हैं। अगर वह कृतज्ञता से हाथ जोड़े तो वह आपको बुलंदी पर ले जाता है। महज़ पचास पैसे के खर्च में ही वह भिखारी आपके मन को खुश रखने वाले मनोचिकित्सक के रूप में काम करता है। इसके विपरीत, यदि वह उदासीनता बरते, तो बेकार में आपकी भावना घायल होती है। आप उसे कृतघ्न कहकर खुद भी दुखी होते हैं। इसी तरह हरेक चीज़ के लिए आप अपनी अपेक्षाओं को बढ़ा लेंगे तो आपका हर काम बोझ बन जाएगा। अनावश्यक रूप से ज़िंदगी जटिल हो जाएगी। भीख देने से आपका फर्ज खत्म हो जाता है। उसके बाद वह उसका पैसा है। उसके लिए धन्यवाद देना या न देना उसकी मर्जी है।”
― Anand Lahar (Hindi)
― Anand Lahar (Hindi)
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