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“रात की सन्नाटों को चिरता चिल्लाता हुआ तेरी यादों का कारवां मेरी तरफ बढ़ रहा हैं तेरी याद को मेरी रात का साथ बड़ा भाता हैं बहुत सी बातें करते हैं तेरी यादें मेरी रातें तेरी याद केअलाव मैं अपनी सर्द रात में लगभग पूरी रात तापता हूँ मेरी तन्हाईयों का गम तेरी याद ही तो काटती हैं अक्सरहां रात तन्हाईयों को बुला कर मुझे उनके आगोश में धकेल देती हैं पर तेरी यादों का पल मुस्कराते हुआ हाथ बढ़ाता हैं और खिंच लाता हैं आगोश से तन्हाईयों के तन्हाईयों को खुद पर हावी होने से रोकने की कोशिशें बहुत करता हूँ पर बगैर तुम्हारें लड़ाई हार सी गया हूँ मुझे हैं भरोसा किसी दिन तुम आवोगी और खिंच कर ले जाओगी उजालो की तरफ़ उस दिन भोर होगा मेरा”
Adarsh Rathor, एहसासों के पन्ने ( Ehsaason Ke Panne ): काव्य संग्रह

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