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Laxman Rao
“उपन्यास ‘दंश’ से ...

मैं और नंदिनी अब दो-दो, चार-चार किलोमीटर घूमने-फिरने लगे थे। परन्तु मैं असमंजस में था कि नंदिनी उन दो मकानों की तरफ चलने के लिए कहती है और उन मकानों के सामने खड़ी हो जाती है। उन मकानों की तरफ देखकर कभी हंसती है, कभी मुस्कराती है तो कभी रोती भी है। इसके क्या कारण हो सकते हैं? शहर के बाहर जेल की विशालकाय इमारत थी। नंदिनी उस जेल की इमारत के सामने खड़ी होकर मेन गेट की तरफ बहुत देर तक देखती रहती थी। जैसे कि कोई कैदी जेल से छूटकर आ रहा हो और नंदिनी उससे मिलना चाहती हो।

अवसर पाकर मैंने नंदिनी से एक दिन उन दो मकानों व जेल के विषय में पूछताछ की।

मैंने उससे पूछा—“आप जेल के सामने खड़ी होकर क्या देखती हो? जेल में आपका कोई परिचित है क्या?”

कुछ क्षण चुप रहने के पश्चात् उसने उत्तर दिया। बोली—“कोई होते थे जेल में, पर अब नहीं हैं।”

एक मकान को वह विद्यालय कहती थी और दूसरे मकान को नर्सिंग होम बताती थी। पर वहां न तो कोई विद्यालय था और न ही नर्सिंग होम। जिसे वह विद्यालय बताती थी वहां एक फैमिली रहती थी और जिसे नर्सिंग होम बता रही थी वह एक खंडहर बना मकान था।”
Laxman Rao

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