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सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
“कलाकार कैसे देश-काल के बन्धन से मुक्त हो जाता है : कोई भी लगन, कोई भी गहरी साधना व्यक्ति को इन बन्धनों से परे ले जाती है। देह का अपना धर्म है; उससे तो मुक्ति नहीं मिलती; पर आत्मा या आत्मा की बात न करें क्योंकि उसके साथ तो अजर-अमर होने की प्रतिज्ञा ही है—मन भी जरामुक्त, चिरयुवा रह जाता है : एक दिन साधक सहसा पाता है कि अरे, यह देह तो बूढ़ी हो गई जब कि भीतर का जीव ज्यों का त्यों है, बल्कि अधिक स्फूर्तियुक्त, अधिक समर्थ…तब अगर वह मन को देह पर छोड़ देता है तभी मन भी जरा का अनुगत हो जाता है, नहीं तो अन्त तक—देह के विघटन-विलयन तक—भी वह वैसा ही अछूता चला जाएगा,”
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', Nadi Ke Dweep

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