कुछ और नज्में महज़ एक किताब नहीं जिसे पढ़ा और भुला दिया! इसमें लिखी नज्में आँखों से होती हुई दिल के रास्ते सीधी रूह में उतर जाती हैं! एक तो गुलज़ार का अंदाजे बयाँ और उस पर उनकी कलम की करामात......
"मुझको भी तरकीब सिखा यार जुलाहे....." और "चाँद क्यूँ अब्र की उस मैली सी गठरी में छुपा था..." जैसी नज्में गुलज़ार साहब का जादू ही तो है, जहाँ रिश्तों की गिरहों को सुलझाने जैसा काम हो या फिर वहसीयत से भरी दुनिया का दोगला रंग दिखाने की कोशिश; ये सब इतनी सादगी के साथ गुलज़ार ही लिख सकते हैं और बड़ी मासूमियत से झंझोड़ देते हैं पढने वाले की रूह को, की जैसे ज़लालत के मूंह पर प्यार से तमाचा मारा हो!
एक और खूबी है साहब की वो है "त्रिवेणी"... अब मेरी तरह आप भी इस खूबी से सहमत हो तो चर्चा करने का मज़ा ही कुछ और है! शेरों - शायरी, नज्में और कविता लिखने वाले तो हजारों हैं पर साहब की तरह "त्रिवेणी" को इजाद कर कम शब्दों की सीमा में पूरी बात पिरो देना ऐसा गुर हर कोई नहीं जनता! महज तीन लाइनों में सवाल को उठा कर फेंक देना फलक तक और वहीं से पटकना ज़मीं पर उसी के उत्तर के साथ ये है त्रिवेणी की विशेषता और यहीं से उपजता है नशा गुलज़ार को पढने का!
एक त्रिवेणी यहाँ पेशे खिदमत है :-
"रात के पेड़ पे कल ही देखा था चाँद, बस, पक के गिरने वाला था
सूरज आया था, ज़रा उसकी तलाशी लेना "
इतनी मासूमियत से भरी इस त्रिवेणी को एक बार पढने भर से ही अंदाज़ लग जाता है की साहब खुद तो गुलज़ार है पर साथ ही उनकी कलम से हमारा साहित्य गुले गुलज़ार है.......
जिसने गुलज़ार को पढ़ा हो, तो निवेदन है कृपया यहाँ अपना अनुभव जरूर बांटे और जो वंचित रह गया है कहीं किसी कोने में, तो बस एक बार रूबरू हो कर देखें! दावा है, फिर इस नशेमन से छूट नहीं पाओगे......
"मुझको भी तरकीब सिखा यार जुलाहे....." और "चाँद क्यूँ अब्र की उस मैली सी गठरी में छुपा था..." जैसी नज्में गुलज़ार साहब का जादू ही तो है, जहाँ रिश्तों की गिरहों को सुलझाने जैसा काम हो या फिर वहसीयत से भरी दुनिया का दोगला रंग दिखाने की कोशिश; ये सब इतनी सादगी के साथ गुलज़ार ही लिख सकते हैं और बड़ी मासूमियत से झंझोड़ देते हैं पढने वाले की रूह को, की जैसे ज़लालत के मूंह पर प्यार से तमाचा मारा हो!
एक और खूबी है साहब की वो है "त्रिवेणी"... अब मेरी तरह आप भी इस खूबी से सहमत हो तो चर्चा करने का मज़ा ही कुछ और है! शेरों - शायरी, नज्में और कविता लिखने वाले तो हजारों हैं पर साहब की तरह "त्रिवेणी" को इजाद कर कम शब्दों की सीमा में पूरी बात पिरो देना ऐसा गुर हर कोई नहीं जनता! महज तीन लाइनों में सवाल को उठा कर फेंक देना फलक तक और वहीं से पटकना ज़मीं पर उसी के उत्तर के साथ ये है त्रिवेणी की विशेषता और यहीं से उपजता है नशा गुलज़ार को पढने का!
एक त्रिवेणी यहाँ पेशे खिदमत है :-
"रात के पेड़ पे कल ही देखा था
चाँद, बस, पक के गिरने वाला था
सूरज आया था, ज़रा उसकी तलाशी लेना "
इतनी मासूमियत से भरी इस त्रिवेणी को एक बार पढने भर से ही अंदाज़ लग जाता है की साहब खुद तो गुलज़ार है पर साथ ही उनकी कलम से हमारा साहित्य गुले गुलज़ार है.......
जिसने गुलज़ार को पढ़ा हो, तो निवेदन है कृपया यहाँ अपना अनुभव जरूर बांटे और जो वंचित रह गया है कहीं किसी कोने में, तो बस एक बार रूबरू हो कर देखें! दावा है, फिर इस नशेमन से छूट नहीं पाओगे......